चुनाव आयोग ने ECINet की सुरक्षा और विकेंद्रीकरण पर दी सफाई, कहा- कोई भी बाहरी अधिकारी नहीं कर सकता बदलाव

भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने अपनी डिजिटल प्रणाली ECINet के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह प्लेटफॉर्म सुरक्षित और विकेंद्रीकृत है और इसका उपयोग केवल निर्धारित अधिकारियोंों द्वारा ही किया जा सकता है।
मुख्य बिंदु:
- ECINet को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और 1951 के प्रावधानों के तहत बनाया गया है।
- केवल BLO, AERO, ERO, DEO और CEO जैसे निर्धारित क्षेत्र अधिकारी ही अपनी यूनिक आईडी और पासवर्ड से इस पर काम कर सकते हैं।
- चुनाव आयोग के अपने अधिकारी भी इस प्लेटफॉर्म पर निर्धारित अधिकारियों के कार्यों को ओवरराइड नहीं कर सकते।
- जनरल इलेक्शन के मतगणना दिन पर ECINet पर लगभग 68 लाख हैकिंग प्रयास हुए थे, जिसे आयोग ने विफल किया।
ECINet की कार्यप्रणाली और सुरक्षा
चुनाव आयोग ने बताया कि ECINet एक विकेंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और 1951 के निर्देशों के अनुसार डिजाइन किया गया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि केवल निर्धारित क्षेत्र अधिकारी जैसे BLO, AERO, ERO, DEO और CEO ही अपनी यूनिक आईडी और पासवर्ड के माध्यम से अपने वैधानिकest statutory functions को पूरा कर सकते हैं। आयोग के भीतर के किसी भी अन्य अधिकारी, जिसमें प्रशासनिक कर्मचारी भी शामिल हैं, को इन अधिकारियों के कार्यों को ओवरराइड करने या बदलने का अधिकार नहीं है।
विवाद और राजनीतिक आरोप
Indian Express की एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर प्रशासनिक तनाव और तकनीकी घर्षण के बारे में दावा किया गया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि चुनाव आयुक्तों ने वोटर डेटाबेस के 'क्रमिक केंद्रीकरण' के बारे में चिंताएं जताई थीं, जिससे जमीनी स्तर के अधिकारियों को स्वतंत्र रूप से बदलाव करने में दिक्कत हो रही थी। इस रिपोर्ट के आधार पर लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर हमला करते हुए आरोप लगाया कि डिजिटल बुनियादी ढांचे पर केंद्रीकृत नियंत्रण के माध्यम से अनधिकृत वोटर लिस्ट से हटाए जा रहे हैं और डेटाबेस में हेरफेर किया जा रहा है।
वोटर वेरिफिकेशन और सुप्रीम कोर्ट का रुख
आयोग ने बताया कि वोटर लिस्ट के शुद्धिकरण के लिए Special Intensive Revision (SIR) शुरू किया गया था। इसके तहत नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए फॉर्म 6 और फॉर्म 8 के साथ Annexure D (घोषणा पत्र) भरना अनिवार्य किया गया। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि यह घोषणा पत्र मतदाताओं की सुविधा के लिए लाया गया था ताकि उन्हें अतिरिक्त दस्तावेजों की आवश्यकता न ध더라도। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रक्रिया और Annexure D की requiremet की वैधता को बरकरार रखा है, यह कहते हुए कि कि यह प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) और संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए आवश्यक है।
वोटर हटाए जाने के आरोपों का खंडन
चुनाव आयोग ने उन आरोपों का पूरी तरह से खारिज कर गया है कि कोई ऑनलाइन टूल या सार्वजनिक एक्सेस मैकेनिज्म के माध्यम से मतदाताओं को हटाया जा सकता है। आयोग ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट से किसी का नाम हटाना या बदलाव करना स्वचालित (automatic) नहीं होता है और इसके लिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना और प्रभावित मतदाता को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।