मेट्रो सेवाओं में कटौती पर DMRC की सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी

दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) ने मेट्रो सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने घुटने टेक दिए हैं। DMRC माफी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक हलफनामे के जरिए पेश की गई है, जिसमें संस्था ने बिना शर्त माफी मांगते हुए अपने खिलाफ जारी अवमानना नोटिस को वापस लेने की प्रार्थना की है। यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने मेट्रो और ट्रेन सेवाओं को पूरी तरह बंद न करने के निर्देशों का पालन नहीं किया।
दरअसल, 11 अक्टूबर को हुई एक विशेष सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यूनियन होम सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और DMRC की चेयरपर्सन डी. थारा ने 9 अक्टूबर के आदेश की अनदेखी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि शहर की परिवहन व्यवस्था को पूरी तरह ठप नहीं किया जा सकता और मेट्रो सेवाओं पर "पूर्ण प्रतिबंध" नहीं होना चाहिए। यह निर्देश कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा चुनाव आयोग के विशेष मतदाता सूची संशोधन के विरोध में किए जा रहे प्रदर्शनों के बीच दिया गया था।
सेवाओं पर DMRC की सफाई
अपने हलफनामे में डी. थारा ने दावा किया कि DMRC ने कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह पालन किया है। मेट्रो प्रशासन का कहना है कि 10 अक्टूबर को सेवाओं का कोई पूर्ण रद्दीकरण नहीं हुआ था और निर्धारित सभी 4,157 ट्रेन ट्रिप सफलतापूर्वक चलाए गए थे। हालांकि, सुरक्षा एजेंसियों के निर्देशों के आधार पर 303 में से केवल 45 स्टेशनों (लगभग 15%) के प्रवेश और निकास द्वारों पर पाबंदियां लगाई गई थीं, जबकि बाकी 85% नेटवर्क सामान्य रूप से काम कर रहा था।
मेट्रो प्रशासन ने यात्रियों की संख्या में आई गिरावट पर भी अपनी बात रखी। DMRC के मुताबिक, उस दिन यात्रियों की संख्या 58 लाख (सामान्य शनिवार) के मुकाबले गिरकर 32 लाख रह गई थी, जिसका कारण विरोध प्रदर्शन थे, न कि सेवाओं में कटौती। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने आरोप लगाया था कि इन पाबंदियों ने सार्वजनिक जीवन को पंगु बना दिया और यह सुप्रीम कोर्ट के अधिकार को कम करने की एक सोची-समझी कोशिश थी। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि स्थानीय बंदिशों के बावजूद मेट्रो का संचालन जारी रहा था।