DHFL केस: वाधवान भाइयों पर अतिरिक्त चार्ज लगाने की CBI की plea कोर्ट ने की खारिज

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने DHFL बैंक फ्रॉड केस में वाधवान भाइयों पर नए आरोप लगाने की CBI की अर्जी को खारिज कर दिया है।

Kittu Kumari30 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
DHFL केस: वाधवान भाइयों पर अतिरिक्त चार्ज लगाने की CBI की plea कोर्ट ने की खारिज

बैंक धोखाधड़ी के चर्चित DHFL मामले में सीबीआई (CBI) को दिल्ली की एक विशेष अदालत से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने पूर्व प्रमोटरों कपिल वाधवान और धीरज वाधवान के खिलाफ अतिरिक्त आरोप लगाने की सीबीआई की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह अपने ही द्वारा दिए गए चार्ज ऑर्डर की समीक्षा नहीं कर सकती, जब तक कि उसमें कोई लिपिकीय या टाइपिंग की गलती न हो।

यह फैसला राउज एवेन्यू जिला अदालत के स्पेशल जज (CBI) संजीव कुमार मल्होत्रा ने सुनाया। सीबीआई ने सीआरपीसी की धारा 216 के तहत एक आवेदन दायर किया था, जिसमें 30 जुलाई को तय किए गए आरोपों में संशोधन की मांग की गई थी। जांच एजेंसी चाहती थी कि कपिल और धीरज वाधवान पर आईपीसी की धारा 409 के तहत आरोप लगाए जाएं। इसके साथ ही, वाधवान भाइयों और सह-आरोपी एस.एम.एन. नकवी पर धारा 467 और आपराधिक साजिश (120B) के तहत भी केस चलाने की मांग की गई थी।

कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?

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सीबीआई की ओर से स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर अनुपम एस शर्मा ने दलील दी कि कानूनन अदालत फैसले से पहले किसी भी स्तर पर आरोपों को बदलने या जोड़ने का अधिकार रखती है। उन्होंने कहा कि गवाहों की रिकॉर्डिंग अभी शुरू ही हुई है, इसलिए नए आरोप लगाने से आरोपियों को कोई नुकसान नहीं होगा। सीबीआई ने दिल्ली हाई कोर्ट के एक पुराने आदेश का भी हवाला दिया था।

दूसरी ओर, बचाव पक्ष के वकीलों ने इस अर्जी का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि सीबीआई केवल अपनी असहमति के कारण न्यायिक फैसले को दोबारा खुलवाना चाहती है, जो कानूनी रूप से गलत है। वकीलों ने कहा कि सीबीआई ने कोई नया सबूत पेश नहीं किया है और धारा 467 के तहत आरोप न तो चार्जशीट में थे और न ही पहले दलीलों के दौरान उठाए गए थे।

अदालत ने अंततः यह माना कि हालांकि कोर्ट के पास आरोपों को बदलने की शक्ति है, लेकिन कोई भी पक्ष इसे अपने अधिकार के रूप में मांग नहीं कर सकता। कोर्ट ने साफ कर दिया कि वह अपने पुराने आदेश पर पुनर्विचार नहीं करेगी, क्योंकि आपराधिक अदालतों के पास अपने ही आदेशों को वापस लेने या रिव्यू करने की अंतर्निहित शक्ति नहीं होती।

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