DGHS मेडिकल खरीद घोटाला: सबूत मिटाने के लिए जानबूझकर नष्ट की गईं टेंडर फाइलें, 839 करोड़ का गबन
ACB ने DGHS मेडिकल खरीद घोटाले में चार्जशीट दाखिल की है, जिसमें 839 करोड़ रुपये के गबन और सबूत मिटाने का आरोप है।

दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग में एक बड़ा मेडिकल खरीद घोटाला सामने आया है। एंटी-करप्शन ब्रांच (ACB) ने अपनी जांच में चौंकाने वाले खुलासे करते हुए आरोप लगाया है कि इस भ्रष्टाचार के सबूतों को मिटाने के लिए टेंडर से जुड़ी महत्वपूर्ण फाइलों को जानबूझकर नष्ट कर दिया गया। ACB के मुताबिक, इस पूरे खेल में नियमों को ताक पर रखकर पांच कंपनियों को करीब 839 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया।
इस मामले में ACB ने पूर्व महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाओं (DGHS) डॉ. वत्सला अग्रवाल, सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (CPA) के पूर्व प्रमुख डॉ. विनोद कुमार रंगा और नीरज चोपड़ा के खिलाफ 12,000 पन्नों की एक विस्तृत चार्जशीट दाखिल की है। स्पेशल जज विद्या प्रकाश ने 17 अक्टूबर को इस चार्जशीट पर संज्ञान लिया, और फिलहाल दस्तावेजों की जांच का दौर चल रहा है।
X-ray मशीन की कीमत में भारी हेराफेरी और साजिश
जांच एजेंसी ने चार्जशीट में बताया कि भ्रष्टाचार का स्तर इतना गहरा था कि जिस एक्स-रे मशीन की कीमत महज 14 लाख रुपये थी, उसे मिलीभगत के जरिए 38 लाख रुपये में खरीदा गया। ACB का दावा है कि सरकारी फंड के कस्टोडियन रहे डॉ. विनोद कुमार रंगा ने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर सरकारी संपत्ति का गबन किया और जानबूझकर सबूत मिटाए।
हैरानी की बात यह है कि जब डॉ. रंगा का तबादला हुआ, तब तक उन्होंने उन लापता फाइलों को खोजने की कोई कोशिश नहीं की। यहां तक कि डॉ. वत्सला अग्रवाल ने भी इन फाइलों का पता लगाने का कोई प्रयास नहीं किया, जिससे यह साफ होता है कि वे जानते थे कि फाइलें कभी वापस नहीं मिलेंगी क्योंकि उन्हें जानबूझकर हटाया गया था।
ACB की जांच में यह भी सामने आया कि:
- भुगतान के लिए GeM (गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस) पोर्टल का इस्तेमाल नहीं किया गया और नियमों की अनदेखी की गई।
- F-Med डिवाइसेस के प्रोप्राइटर राजीव कुमार उर्फ राजीव रंगीला ने सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर आपराधिक साजिश रची।
- AI सॉफ्टवेयर वाली 448 पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों की खरीद में भारी हेराफेरी की गई।
- बैंक रिकॉर्ड्स और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के जरिए यह पता लगाया गया है कि 839 करोड़ रुपये पांच मुख्य लाभार्थी कंपनियों को भेजे गए।
प्रशासनिक आदेशों के अनुसार, टेंडर और बिड्स की फाइलें CPA प्रमुख की सुरक्षित कस्टडी में होनी चाहिए थीं, लेकिन जब नए अधिकारियों ने कार्यभार संभाला, तो पाया गया कि महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सौंपे ही नहीं गए थे। अब ACB इन पैसों के अंतिम लाभार्थियों की पहचान करने के लिए बैंक खातों की गहनता से जांच कर रही है।