दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा पर बहस तेज, हालिया हिंसा के मामलों के बाद उठे बड़े सवाल

दिल्ली में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ हाल ही में हुई हिंसक वारदातों के बाद सार्वजनिक सुरक्षा को लेकर एक गंभीर बहस शुरू हो गई है। इस चर्चा में मुख्य सवाल यह उठाया जा रहा है कि क्या सुरक्षा व्यक्तिगत आत्मरक्षा पर आधारित होनी चाहिए या शहरी बुनियादी ढाँचे में बड़े बदलाव किए जाने चाहिए। इन घटनाओं में कालकाजी के आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार, सदर बाजार की एक दुकान में 11 वर्षीय बच्ची का यौन उत्पीड़न, सार्वजनिक बस में 16 वर्षीय लड़की पर हमला और स्वरूप नगर में 17 वर्षीय लड़की का अपहरण शामिल है। इसके अलावा अन्य मामलों में एक 10वीं कक्षा की छात्रा को सार्वजनिक सड़क पर घेरा गया और एक 17.वर्षीय किशोरी को पुलिसकर्मी बनकर आए लोगों ने पार्क में निशाना बनाया।
आधिकारिक आंकड़े और अपराध की स्थिति
सरकारी आंकड़े इस स्थिति की गंभीरता को पूरी तरह से उजागर करते हैं। साल 2024 में दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ कुल 13,396 अपराध दर्ज किए गए, जिनमें 1,058 बलात्कार के मामले शामिल हैं, इसके अलावा बच्चों के खिलाफ 7,662 अपराध दर्ज हुए। दिल्ली पुलिस के अनुसार साल 2025 में बलात्कार के 1,901 मामले दर्ज किए गए जो कि साल 2024 में 2,076 और साल 2023 में 2,141 थे। हालांकि देश भर में मुकदमों के दौरान बलात्कार के मामलों में सजा की दर लगभग 25 प्रतिशत पर स्थिर बनी हुई है। पूरे भारत में साल 2024 के दौरान औसतन हर दिन 80 बलात्कार के मामले सामने आए।
विशेषज्ञों और न्यायपालिका की प्रतिक्रिया
कानूनी और सामाजिक विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं के लिए आत्मरक्षा प्रशिक्षण पर मौजूदा जोर अक्सर सुरक्षा का पूरा बोझ पीड़ित पर डाल देता है। आत्मरक्षा विशेषज्ञ पांडे ने बताया कि ऐसे कौशल आत्मविश्वास तो बढ़ाते हैं लेकिन संस्थागत जिम्मेदारी सबसे ऊपर है। महिला अधिकार कार्यकर्ता योगिता भायना ने तर्क दिया कि कानूनी सुधार 'मानसिकता में बदलाव' के मुख्य मुद्दे को हल करने में विफल रहे हैं, जबकि एनजीओ शक्ति वाहिनी की भारती शर्मा ने पुलिस कर्मियों के बीच बेहतर संवेदनशीलता की आवश्यकता पर जोर दिया। स्नेहा संस्था की नयरीन दारूवाला ने कहा कि व्यक्तिगत सावधानी की जगह सामुदायिक प्रणालियों को मुख्य सुरक्षा रणनीति बनाया जाना चाहिए।
अदालती कार्रवाई और पुलिस के कदम
न्यायपालिका ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त की है और भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हिंसा में हालिया वृद्धि के जवाब में 'कानून प्रवर्तन की व्यवस्थित विफलता' का हवाला दिया है। इसी तरह दिल्ली उच्च न्यायालय ने घोषणा की है कि सच्ची आज़ादी और सशक्तिकरण के लिए बिना किसी डर के घूमने का अधिकार होना आवश्यक है। इस संकट के जवाब में दिल्ली पुलिस ने सामुदायिक सुरक्षा के लिए स्थानीय संगठनों के साथ साझेदारी शुरू की है और कालकाजी में 'मिडनाइट वॉक' जैसे आयोजनों के दौरान सुरक्षा बढ़ा दी है। सेफसिटीपिन जैसे संगठन 'अंधेरे स्थानों' की पहचान करने के लिए लगातार तकनीक का उपयोग कर रहे हैं, जबकि लेडी श्रीराम कॉलेज की अनुषा गर्ग सहित छात्र नेताओं का कहना है कि व्यक्तिगत सावधानियां सरकार की ओर से सुरक्षित सार्वजनिक स्थान सुनिश्चित करने वाली नीति का विकल्प नहीं हो सकती हैं।