दिल्ली में वोटर लिस्ट सुधार अभियान के दौरान सर्वर ठप, लोगों को हुई भारी परेशानी

Kittu Kumari21 September 20262 min read0 viewsDelhi Local
दिल्ली में वोटर लिस्ट सुधार अभियान के दौरान सर्वर ठप, लोगों को हुई भारी परेशानी
  • दिल्ली के 14,947 मतदान केंद्रों पर विशेष शिविर आयोजित किए गए।
  • सर्वर में खराबी के कारण लोगों को वोटर विवरण ठीक कराने में भारी देरी का सामना करना पड़ा।
  • 3.3 करोड़ से अधिक लोगों को डेटा सत्यापन के लिए नोटिस जारी किए गए हैं।

रविवार, 20 सितंबर 2026 को दिल्ली के सभी 14,947 मतदान केंद्रों पर विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के तहत विशेष शिविर आयोजित किए गए थे। अपने वोटर विवरण में गलतियों को सुधारने के लिए आने वाले नागरिकों को बड़े पैमाने पर सर्वर ठप होने के कारण भारी देरी और रुकावटों का सामना करना पड़ा। चुनाव आयोग ने बताया कि बड़ी संख्या में लोग नाम में गड़बड़ी से संबंधित नोटिस लेकर पहुंचे थे।

चुनाव आयोग की सफाई

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दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने स्पष्ट किया कि ऐसा नोटिस मिलने का मतलब मतदाता सूची से नाम का काटा जाना नहीं है। लाल कृष्ण आडवाणी, एस. जयशंकर, मनीष सिसोदिया, अरविंद केजरीवाल और चुनाव आयुक्त एस.एस. संधू जैसी प्रमुख हस्तियों सहित 3.3 करोड़ से अधिक व्यक्तियों को जारी किए गए ये नोटिस डेटा सत्यापन के लिए हैं। अधिकारियों ने कहा कि बिना सुनवाई का मौका दिए किसी भी मतदाता का नाम नहीं हटाया जाएगा। ये नोटिस मुख्य रूप से उन लोगों को दिए जा रहे हैं जिनका डेटा 2002 के एसआईआर रिकॉर्ड से सत्यापित नहीं हो सका या जिनकी जानकारी में त्रुटियां हैं। विस्तृत जानकारी यहां देखें

नाम जोड़ने और सुधार की अंतिम तारीख

मतदाता सूची का मसौदा 31 अगस्त 2026 को जारी किया गया था। मसौदे में जिन मतदाताओं के नाम गायब हैं, वे 30 सितंबर 2026 तक जरूरी दस्तावेजों के साथ फॉर्म-6 भरकर जमा कर सकते हैं। दावों और आपत्तियों का निपटारा तथा जारी नोटिसों का समाधान 29 अक्टूबर 2026 तक पूरा किया जाना है। इसके बाद 4 नवंबर 2026 को मतदाता सूचियों का अंतिम प्रकाशन किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट 21 सितंबर 2026 को मौजूदा एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करने वाला है। इस कानूनी चुनौती में मसौदा सूची से 47.56 लाख नाम हटाने और लगभग 33 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी करने पर सवाल उठाया गया है। इससे फर्जी, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं की पहचान करने के लिए चलाए जा रहे इस अभियान की पारदर्शिता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

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