दिल्ली यूनिवर्सिटी का 'कार्बन गार्डन' मॉडल उज्बेकिस्तान में स्थापित, प्रदूषण से लड़ने की नई पहल
दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर दीनाबंधु साहू का 'कार्बन गार्डन' मॉडल अब उज्बेकिस्तान में, जो हवा और मिट्टी के प्रदूषण को कम करेगा।

दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक अनोखे प्रयोग ने अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना ली है। यूनिवर्सिटी के बॉटनी विभाग के हेड और रिसर्च, इनोवेशन एंड एंटरप्रेन्योरशिप काउंसिल के चेयरमैन प्रोफेसर दीनाबंधु साहू द्वारा विकसित 'कार्बन गार्डन' मॉडल अब उज्बेकिस्तान की समरकंद स्टेट यूनिवर्सिटी में स्थापित किया गया है। अक्टूबर 2026 के मध्य में इस 'इंडियन कार्बन गार्डन' का उद्घाटन प्रोफेसर साहू और समरकंद स्टेट यूनिवर्सिटी के रेक्टर व उज्बेकिस्तान के सीनेटर प्रोफेसर रुस्तम खलमुरादोव की मौजूदगी में हुआ।
क्या है यह कार्बन गार्डन और कैसे काम करता है?
यह कोई साधारण सजावटी बगीचा नहीं है, बल्कि एक जटिल जैविक प्रणाली है जिसे शहरी हवा और मिट्टी के प्रदूषण से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है। यह मॉडल शैवाल (algae), कवक (fungi), बैक्टीरिया और करीब 45 से 50 विभिन्न प्रकार के पौधों, जिनमें जड़ी-बूटियां, झाड़ियां और पेड़ शामिल हैं, के संयोजन से बनाया गया है। यह सिस्टम कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों को सोखने का काम करता है। इसकी खास बात यह है कि इसमें पेड़ की छाल के सूक्ष्मजीवों (microbiota) का इस्तेमाल किया गया है, जो वातावरण में मौजूद हानिकारक ऑर्गेनिक कंपाउंड्स को खत्म करते हैं।
इस प्रोजेक्ट की शुरुआत दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस में 2,000 वर्ग फुट के एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में हुई थी। प्रोफेसर रुस्तम खलमुरादोव ने इस मॉडल की सराहना करते हुए कहा कि मध्य एशिया के जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों के लिए यह जैविक मॉडल बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा।
वहीं, दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह ने चेतावनी दी है कि अगर प्रकृति आधारित हस्तक्षेपों को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो शहर देश की 'प्रदूषण राजधानी' बनने के जोखिम में है। प्रोफेसर साहू का मानना है कि यदि इन आत्मनिर्भर प्रणालियों को स्कूलों, आवासीय क्षेत्रों और ऑफिस कॉम्प्लेक्स में व्यापक रूप से लागू किया जाए, तो इससे न केवल हवा की गुणवत्ता सुधरेगी, बल्कि लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।