दिल्ली के छात्रों का बड़ा आरोप: प्रदर्शनों के बाद भी देशभर में हो रही है पुलिस प्रताड़ना और निगरानी

दिल्ली के छात्रों ने राष्ट्रीय राजधानी में हुए प्रदर्शनों के खत्म होने के काफी समय बाद भी देश भर में लगातार पुलिस प्रताड़ना और निगरानी का गंभीर आरोप लगाया है। छात्रों के अनुसार, पुलिस बार-बार घर आ रही है, माता-पिता और रिश्तेदारों से पूछताछ कर रही है और लगातार निगरानी रखी जा रही है, जो तमिलनाडु, ओडिशा और बेंगलुरु जैसे राज्यों तक फैली हुई है। इन आरोपों में प्रदर्शनों के महीनों और यहां तक कि सालों बाद भी डराने-धमकाने के तरीके अपनाने की बात कही गई है, जिसमें पुलिसकर्मियों की कथित कार्रवाई शामिल है।
हालिया घटनाएं और गिरफ्तारियां
हाल की घटनाएं इन दावों को पुख्ता करती हैं। 6 अगस्त 2026 को, एमएस गुरकीरत को दिल्ली विश्वविद्यालय में फरवरी 2026 के यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के इक्विटी रेगुलेशंस से जुड़े प्रदर्शनों में शामिल होने के कारण गिरफ्तार किया गया था। जमानत पर छूटने के बाद उन्होंने शिकायत की कि उन्हें चेतावनी दी गई थी कि "अगला केस एक बड़ा माओवादी केस होगा"। इसके अलावा, 8 अगस्त 2026 को NEET परीक्षा की अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शनों में शामिल मुस्लिम छात्रों ने दिल्ली पुलिस द्वारा शारीरिक मारपीट, डराने-धमकाने और इस्लामफोबिक गालियों का सामना करने की बात कही, जिसमें एक प्रदर्शनकारी ने बताया कि उसे "देशद्रोही" कहा गया। ऑनलाइन उत्पीड़न और पुलिस कार्रवाई भी जारी है, जिसमें सखी जैसी कार्यकर्ताओं ने कंटेंट ब्लॉक करने और जान से मारने की धमकी मिलने का आरोप लगाया है, जबकि कॉकरोच जनता पार्टी के सौरव दास ने गैरकानूनी तरीके से घर में घुसने और इंस्टाग्राम पर पाबंदी लगाने की शिकायत की है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और अदृश्य फैसले
इस स्थिति पर राजनीतिक तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 8 अगस्त 2026 को छात्र प्रदर्शनों पर पुलिस की हिंसक कार्रवाई की कड़ी आलोचना की और गृह मंत्री अमित शाह को पुलिस एक्शन के लिए जिम्मेदार ठहराया। इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने 3 अगस्त 2026 को अपने पिछले आदेश को स्पष्ट करते हुए राज्य सरकारों को कानून के अनुसार छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR की कार्यवाही वापस लेने की छूट दी और "आपराधिक इतिहास" को केवल "गंभीर और जघन्य अपराधों" तक सीमित कर दिया। 28 अगस्त 2026 (मूल रूप से 28 जुलाई 2026) के पिछले निर्देशों में 18 वर्ष से कम उम्र के गिरफ्तार लोगों को रिहा करने, सर्विलांस फुटेज सुरक्षित रखने और गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड न रखने वाले प्रदर्शनकारियों को जबरन कार्रवाई से सुरक्षा देने का आदेश दिया गया था, साथ ही उनके डिजिटल और निजी डेटा को सार्वजनिक रूप से उजागर करने पर रोक लगाई गई थी। डिजिटल राइट्स संस्था SFLC.in ने भी प्रदर्शनों के दौरान चेहरे की पहचान (facial recognition) जैसी मास सर्विलांस तकनीकों के इस्तेमाल पर चिंता जताई है, और The Hindu के एक संपादकीय में पुलिस जवाबदेही की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।