संसदीय नियमों को जेंडर-न्यूट्रल बनाने की मांग, दिल्ली स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने दिए आधुनिकीकरण के सुझाव

दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने संसदीय नियमों को जेंडर-न्यूट्रल बनाने और डिजिटल सुधारों को अपनाने का प्रस्ताव दिया है।

Kittu Kumari27 October 20262 min read0 viewsNational
संसदीय नियमों को जेंडर-न्यूट्रल बनाने की मांग, दिल्ली स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने दिए आधुनिकीकरण के सुझाव

देश की विधायी संस्थाओं में कामकाज के तौर-तरीकों को आधुनिक और समावेशी बनाने की दिशा में एक बड़ी पहल की गई है। दिल्ली विधानसभा के स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने संसदीय नियमों में आमूलचूल बदलाव की वकालत की है। उन्होंने जोर देकर कहा है कि अब समय आ गया है जब हमारे विधायी नियमों में इस्तेमाल होने वाली भाषा को जेंडर-न्यूट्रल (लिंग-तटस्थ) बनाया जाए, ताकि यह आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों और 'नारी शक्ति' के सम्मान को प्रतिबिंबित कर सके।

यह चर्चा मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को एक विशेष समिति की बैठक के दौरान हुई। इस समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा किया गया था, जिसका उद्देश्य भारत की विभिन्न विधायी संस्थाओं के लिए समान प्रक्रिया और संचालन के मॉडल नियम तैयार करना है। उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और नागालैंड के विधानसभा अध्यक्षों ने भी हिस्सा लिया।

डिजिटल सुधार और संवैधानिक स्वायत्तता पर जोर

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विजेंद्र गुप्ता ने स्पष्ट किया कि 'एकसमान नियमों' का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि सभी के लिए 'एक जैसे' नियम हों। उन्होंने तर्क दिया कि भारत की विधायी विविधता और अलग-अलग विधानसभाओं की संवैधानिक स्वायत्तता का सम्मान किया जाना चाहिए। विशेष रूप से दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट कानूनी स्थिति को देखते हुए उन्होंने कहा कि मॉडल नियमों में इन क्षेत्रों की संवैधानिक स्थिति का पूरा ध्यान रखा जाए।

स्पीकर गुप्ता ने कामकाज को बेहतर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जिनमें शामिल हैं:

  • डिजिटल ट्रांजिशन: इलेक्ट्रॉनिक नोटिस के उपयोग और डिजिटल प्रथाओं को पूरी तरह अपनाने की सलाह।
  • सत्रों की संख्या: राज्य विधानसभाओं के लिए साल में कम से कम 30 बैठकें अनिवार्य करने का प्रस्ताव।
  • जनभागीदारी: याचिकाओं (petitions) के फॉर्म से औपनिवेशिक दौर के शब्दों को हटाकर उन्हें आधुनिक बनाना, क्षेत्रीय भाषाओं का उपयोग करना और इलेक्ट्रॉनिक सबमिशन की अनुमति देना।
  • प्रक्रियात्मक स्वतंत्रता: पीठासीन अधिकारियों को अधिक प्रक्रियात्मक स्वायत्तता प्रदान करना।

इस बैठक की एक खास बात यह रही कि इसे पूरी तरह 'पेपरलेस' रखा गया। दिल्ली विधानसभा सचिवालय के अनुसार, डिजिटल दस्तावेजों के उपयोग से करीब 18,252 कागजों की बचत हुई, जिससे लगभग 4.4 पेड़ों और 18,252 लीटर पानी को बचाने में मदद मिली। इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन में भी 182.5 किलोग्राम की कमी आई।

गौरतलब है कि यह पूरी प्रक्रिया पटना में आयोजित 85वीं अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन के एक प्रस्ताव के बाद शुरू हुई थी, जिसकी पहली प्रारंभिक बैठक 12 मई 2026 को मैसूर में हुई थी।

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