दिल्ली सरकार का बड़ा फैसला: स्लम पुनर्विकास नीति लागू, 675 क्लस्टर्स में बनेंगे हाई-राइज घर

दिल्ली सरकार ने स्लम पुनर्विकास नीति 2026 लागू की है, जिसके तहत 675 क्लस्टर्स में हाई-राइज घर बनाए जाएंगे।

Kittu Kumari5 November 20262 min read0 viewsDelhi Local
दिल्ली सरकार का बड़ा फैसला: स्लम पुनर्विकास नीति लागू, 675 क्लस्टर्स में बनेंगे हाई-राइज घर

दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में रहने वाले लाखों परिवारों के लिए एक बड़ी खुशखबरी आई है। दिल्ली सरकार ने 'दिल्ली स्लम और झुग्गी-झोपड़ी पुनर्वास और स्थानांतरण नीति, 2026' को आधिकारिक तौर पर अधिसूचित कर दिया है। इस नई योजना का मुख्य उद्देश्य पुरानी बस्तियों की जगह आधुनिक हाई-राइज आवासीय परिसर बनाना है, जिससे करीब 5 लाख परिवारों के जीवन स्तर में सुधार होगा।

सरकार ने कुल 675 चिन्हित जेजे क्लस्टर्स को इस योजना के दायरे में रखा है, हालांकि अधिकारियों द्वारा कुल 750 क्लस्टर्स की पहचान की जा सकती है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत पहले चरण में सीलमपुर, सुल्तानपुरी और लाजपत नगर से होगी। इन इलाकों के 17 स्लम सेटलमेंट्स को तुरंत कार्रवाई के लिए चुना गया है, जहां करीब 4,870 झुग्गियों को हटाकर तीन एकीकृत हाई-राइज आवासीय कॉलोनियां विकसित की जाएंगी।

PPP मॉडल से बदलेगी बस्तियों की सूरत

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इस पूरी परियोजना को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत लागू किया जा रहा है। इसका मतलब है कि निजी डेवलपर्स इन बस्तियों में 'इन-सीटू' हाउसिंग (मौजूदा जगह पर या 3 किलोमीटर के दायरे में) का निर्माण करेंगे। बदले में, डेवलपर्स को जमीन के व्यावसायिक रूप से मूल्यवान हिस्सों पर मिश्रित उपयोग के विकास के अधिकार दिए जाएंगे।

पुनर्वास योजना का लाभ उठाने के लिए निवासियों को 1 जनवरी, 2025 की कट-ऑफ तारीख का पालन करना होगा। दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) ने पहले ही 'ट्रांजैक्शन एडवाइजर्स' की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो व्यवहार्यता अध्ययन करेंगे और निजी डेवलपर्स के चयन में मदद करेंगे। यह प्रक्रिया अगले चार महीनों में पूरी होने की उम्मीद है।

खास बात यह है कि ये नई आवासीय कॉलोनियां केवल मकानों तक सीमित नहीं होंगी। इनमें आंगनवाड़ी केंद्र, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा के साधन और खेल के मैदान जैसे सामुदायिक बुनियादी ढांचे का होना अनिवार्य है। यह नीति 2015 के पुराने ढांचे से एक बड़ा बदलाव है, जिसमें अब सरकार सीधे कार्यान्वयन के बजाय निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्राथमिकता दे रही है।

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