दिल्ली दंगे: आरोपी शादाब अहमद को सुप्रीम कोर्ट से झटका, जमानत शर्तों में ढील देने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों के आरोपी शादाब अहमद की जमानत शर्तों में ढील देने से इनकार किया और उसे ट्रायल कोर्ट जाने को कहा।

2020 के दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के मामले में आरोपी शादाब अहमद की मुश्किलें कम नहीं होने वाली हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उसकी जमानत की शर्तों में बदलाव करने की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह अपनी मांगों के लिए ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है, लेकिन शीर्ष अदालत इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी।
शादाब अहमद ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उसे गाजियाबाद जाने की अनुमति दी जाए ताकि वह वहां कानून (Law) की पढ़ाई कर सके। इसके अलावा, उसने दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के ऑफिस में अपनी हाजिरी की शर्तों में भी बदलाव की मांग की थी। फिलहाल उसे हफ्ते में दो बार रिपोर्ट करना होता है, जिसे वह घटाकर एक बार करवाना चाहता था।
अदालत की सख्त टिप्पणी और कानूनी पेच
सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने शादाब के वकील की दलीलों को सुना। वकील ने तर्क दिया कि शादाब ने गाजियाबाद के एक कॉलेज में तीन साल के लॉ कोर्स में दाखिला लिया है और वह अपनी शिक्षा के जरिए खुद को सुधारना चाहता है। वकील ने यह भी कहा कि अगस्त से कक्षाएं शुरू हो चुकी हैं और वह पढ़ाई में पिछड़ रहा है, इसलिए वह सुबह जाकर शाम को वापस आने की अनुमति चाहता है।
इस दलील पर जस्टिस कुमार ने तल्ख अंदाज में सवाल किया कि शादाब ने दिल्ली के तमाम लॉ कॉलेजों को छोड़कर गाजियाबाद का कॉलेज क्यों चुना। कोर्ट ने पूछा कि क्या वह पहले ट्रायल कोर्ट गया था और वहां उसकी अर्जी खारिज हुई? जब वकील ने कहा कि ट्रायल कोर्ट सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई गई शर्तों को नहीं बदल सकता, तब भी बेंच अपने फैसले पर अडिग रही। अंत में, वकील ने अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी।
आपको बता दें कि शादाब अहमद को 5 जनवरी को अन्य सह-आरोपियों के साथ जमानत मिली थी। सुप्रीम कोर्ट ने उसकी रिहाई के साथ 11 कड़ी शर्तें रखी थीं। इन शर्तों के मुताबिक, वह बिना अनुमति दिल्ली नहीं छोड़ सकता, किसी भी रैली या सार्वजनिक बैठक में हिस्सा नहीं ले सकता और न ही किसी डिजिटल या फिजिकल प्लेटफॉर्म पर कोई पोस्टर या बैनर प्रचारित कर सकता है।
यह पूरा मामला 2019-2020 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और उसके बाद फरवरी 2020 में दिल्ली में भड़के सांप्रदायिक दंगों की साजिश से जुड़ा है। आरोपियों पर यूएपीए (UAPA) और आईपीसी की गंभीर धाराएं लगाई गई हैं।