दिल्ली में NSUI का हल्लाबोल मार्च: CEC के इस्तीफे की मांग और जंतर मंतर पर हंगामा

देश की राजधानी दिल्ली में एक बार फिर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) ने 'उंगली तो उठेगी - हल्लाबोल मार्च' के जरिए जंतर मंतर तक विरोध प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना था। वहीं, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार पर 'वोट चोरी' में शामिल होने के गंभीर आरोप लगाए हैं, जिससे राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट भी सक्रिय है और पुलिस हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों और विरोध करने के अधिकारों से जुड़ी याचिकाओं की समीक्षा कर रहा है। दूसरी ओर, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत डिपके को 17 अक्टूबर को रिहाई मिल गई, लेकिन उनके सह-संयोजक आशुतोष रंका और सौरव दास की जमानत अब भी अटकी हुई है। नेशनल अलायंस ऑफ जर्नलिस्ट्स (NAJ) ने मीडिया पर बढ़ती सख्ती पर चिंता जताई है और वर्तमान स्थिति की तुलना आपातकाल (इमरजेंसी) से की है। इसके साथ ही, ह्यूमन राइट्स वॉच ने चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, जिसमें कथित तौर पर 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटा दिए गए हैं।
पाकिस्तान में इमरजेंसी और ब्राजील चुनाव की हलचल
भारत के बाहर की बात करें तो पाकिस्तान में हालात काफी तनावपूर्ण हैं। वहां के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने 12 अक्टूबर 2026 को राज्य आपातकाल (स्टेट ऑफ इमरजेंसी) घोषित कर दिया है। इसके तहत पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के नेतृत्व वाली खैबर पख्तूनख्वा (KP) की प्रांतीय सरकार को निलंबित कर दिया गया है। PTI का दावा है कि उनके मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी और प्रांतीय अध्यक्ष जुनैद अकबर को हिरासत में लिया गया है। वहां इंटरनेट सेवाओं में भारी गिरावट आई है और मीडिया पर भी कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा हो रही है।
वहीं, ब्राजील में 25 अक्टूबर को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर के लिए मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। लुइज़ इनासियो लुला डी सिल्वा और सीनेटर फ्लेवियो बोल्सोनारो के बीच कांटे की टक्कर है। पहले दौर के नतीजों में बोल्सोनारो 47.03% वोटों के साथ आगे रहे, जबकि लुला को 45.16% वोट मिले। इस चुनाव में 'इवेंजेलिकल' वोट बैंक की बड़ी भूमिका नजर आ रही है, जिनमें से करीब 72.7% लोग बोल्सोनारो के समर्थन में हैं। डिजिटल कैंपेन और धार्मिक प्रभाव के जरिए इस वोट बैंक को एकजुट करने की कोशिशें तेज हो गई हैं।