वोटर लिस्ट संशोधन के खिलाफ दिल्ली में बवाल, 100 से ज्यादा प्रदर्शनकारी हिरासत में
दिल्ली में वोटर लिस्ट संशोधन के खिलाफ प्रदर्शन करने निकले 100 से ज्यादा लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया। जानें क्या है पूरा मामला।

देश की राजधानी दिल्ली में शुक्रवार को उस समय भारी तनाव देखा गया जब मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision) के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों को दिल्ली पुलिस ने रोक लिया। यह प्रदर्शन इतना उग्र था कि अशोक रोड स्थित भारत निर्वाचन आयोग के मुख्यालय की ओर बढ़ रहे 100 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। प्रदर्शनकारी हाथों में तिरंगा और बैनर लिए चुनाव आयोग के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे।
यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब प्रदर्शनकारी गोले डाकखाने इलाके से चुनाव आयोग के दफ्तर की ओर मार्च कर रहे थे। पुलिस ने सुरक्षा कारणों से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू कर दी और बंगला साहिब गुरुद्वारे के पास ही मार्च को रोक दिया। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग इस विशेष संशोधन प्रक्रिया को तुरंत रद्द करने और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की थी। इस विरोध प्रदर्शन का आयोजन 'दिल्ली कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ पीपल अगेंस्ट SIR' द्वारा किया गया था, जिसे संयुक्त किसान मोर्चा, विभिन्न ट्रेड यूनियनों, छात्र संगठन AISA और वामपंथी दलों का समर्थन मिला था।
क्यों हो रहा है मतदाता सूची संशोधन का विरोध?
निर्वाचन आयोग के अनुसार, इस विशेष संशोधन प्रक्रिया का उद्देश्य वोटर लिस्ट को शुद्ध करना है, ताकि मृत व्यक्तियों, शिफ्ट हो चुके लोगों और डुप्लीकेट नामों को हटाया जा सके। हालांकि, विपक्षी समूहों और 'कॉकरोच जनता पार्टी' जैसे संगठनों का आरोप है कि यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से प्रेरित है और इसके जरिए जानबूझकर कुछ खास समुदायों के वैध मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहले तीन चरणों में लगभग 13.39 करोड़ नामों को अनुपस्थित, शिफ्टेड या मृत श्रेणियों में रखा गया था। हालांकि चुनाव आयोग का कहना है कि ये केवल ड्राफ्ट स्टेज की मार्किंग है और मतदाता अपनी आपत्ति दर्ज कराकर नाम वापस पा सकते हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सॉफ्टवेयर की गड़बड़ियों के कारण नामों के अनुवाद में बड़ी गलतियां सामने आईं, जिससे डिजिटल रोल की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
भले ही सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के इस अधिकार को सही ठहराया हो, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने इसे मानने से इनकार कर दिया है। उन्होंने ऐलान किया है कि यह आंदोलन अब रुकने वाला नहीं है और नवंबर की पहली तारीख तक 18 राज्यों में 145 से ज्यादा संगठन इस लड़ाई को आगे बढ़ाएंगे।