डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी की कोशिश, दिल्ली पुलिस ने बचाए 1.53 करोड़ रुपये

आजकल साइबर अपराधी लोगों को डराने के लिए नए-नए तरीके अपना रहे हैं, जिसमें 'डिजिटल अरेस्ट' एक खतरनाक तरीका बनकर उभरा है। दिल्ली पुलिस की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रेटेजिक ऑपरेशंस (IFSO) यूनिट ने मुस्तैदी दिखाते हुए पांच अलग-अलग राज्यों में इस तरह के फ्रॉड को नाकाम किया और कुल 1.53 करोड़ रुपये की राशि को डूबने से बचा लिया। यह पूरी कार्रवाई फाइनेंशियल मॉनिटरिंग सेल (FMC) की प्रोएक्टिव विक्टिम आइडेंटिफिकेशन एंड प्रोटेक्शन टीम द्वारा की गई।
यह मामला 14 सितंबर से 1 अक्टूबर के बीच का है, जब नेशनल साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कई शिकायतें दर्ज कराई गईं। जालसाजों ने खुद को TRAI के अधिकारी और IPS ऑफिसर बताकर लोगों को धमकाया। वे पीड़ितों को यह विश्वास दिला रहे थे कि उनके आधार कार्ड का गलत इस्तेमाल हुआ है या वे मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर अपराधों में शामिल हैं। डर के मारे लोग अपनी जमा पूंजी उन्हें ट्रांसफर करने को तैयार हो गए थे, लेकिन पुलिस ने समय रहते हस्तक्षेप किया।
इन राज्यों के लोगों को बचाई गई बड़ी रकम
इस ऑपरेशन के जरिए दिल्ली पुलिस ने देश के पांच राज्यों में वित्तीय हस्तक्षेप कर पैसे सुरक्षित किए। इसमें गुजरात में 75 लाख रुपये, महाराष्ट्र में 55 लाख रुपये, राजस्थान में 10 लाख रुपये, उत्तर प्रदेश में 10 लाख रुपये और दिल्ली में 3.48 लाख रुपये बचाए गए। ठगी का शिकार होने वाले लोगों में सागरपुर के एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी, नजफगढ़ के 77 वर्षीय रिटायर्ड AAI कर्मचारी, राजस्थान के एक 80 वर्षीय कपड़ा व्यापारी और गुजरात के एक 50 वर्षीय व्यवसायी शामिल थे।
जांच के दौरान IFSO यूनिट ने पाया कि ठगों ने बैंक ऑफ बड़ौदा, ICICI बैंक, SBI और एक्सिस बैंक जैसे संस्थानों में 'म्यूल अकाउंट्स' (फर्जी खाते) का इस्तेमाल किया था, जिनमें से एक खाता हैदराबाद में पाया गया।
दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया है कि कानून में 'डिजिटल अरेस्ट' जैसा कोई प्रावधान नहीं है। CBI, NIA या RBI जैसी कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करती और न ही पैसे की मांग करती है। पुलिस ने नागरिकों को सलाह दी है कि यदि कोई संदिग्ध कॉल आए, तो तुरंत उसे काट दें, अपनी बैंकिंग जानकारी साझा न करें और तुरंत cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें या 1930 नंबर पर कॉल करें।