जंतर मंतर को विरोध स्थल बनाने के फैसले पर दिल्ली पुलिस की सफाई, सुप्रीम कोर्ट में कहा- MHA पैनल ने माना था अनुपयुक्त
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि जंतर मंतर को विरोध स्थल न रखने का फैसला MHA पैनल की रिपोर्ट पर आधारित था।

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर स्पष्ट किया है कि जंतर मंतर को विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्धारित स्थल (नोटिफाइड वेन्यू) से हटाने का फैसला काफी समय से विचारधीन था। पुलिस ने कहा कि यह कदम गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा गठित एक समिति की सिफारिशों के आधार पर उठाया गया है, जिसने इस जगह को प्रदर्शनों के लिए अनुपयुक्त पाया था। यह पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेशों से पहले ही शुरू हो चुकी थी।
पत्रकार स्वाति सिंह द्वारा दायर एक याचिका के जवाब में दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने कहा कि यह कहना गलत होगा कि जंतर मंतर को सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश के बाद हटाया गया। पुलिस के मुताबिक, गृह मंत्रालय ने 26 अगस्त को एक समिति बनाई थी ताकि यह जांचा जा सके कि क्या जंतर मंतर को विरोध स्थल के रूप में जारी रखना चाहिए या किसी वैकल्पिक जगह की तलाश करनी चाहिए। इस समिति की रिपोर्ट सितंबर में मिल गई थी और 14 सितंबर को इसे दिल्ली पुलिस को भेज दिया गया था, जो कोर्ट के आदेश से काफी पहले की बात है।
ट्रैफिक जाम और सुरक्षा कारणों से लिया गया फैसला
पुलिस ने कोर्ट को बताया कि जंतर मंतर की वर्तमान स्थिति अब काफी बदल चुकी है। पुलिस के अनुसार, यह क्षेत्र मूल रूप से एक सार्वजनिक सड़क है, न कि कोई पारंपरिक विरोध स्थल। यहां हर साल 1,300 से ज्यादा प्रदर्शन होते हैं, जबकि इसकी क्षमता केवल 1,500 लोगों की है। भीड़ बढ़ने पर प्रदर्शनकारी जनपथ और कनॉट प्लेस तक फैल जाते हैं, जिससे ट्रैफिक मैनेजमेंट में भारी दिक्कत आती है।
हलफनामे में कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े पेश करते हुए पुलिस ने बताया कि जंतर मंतर के 3-4 किलोमीटर के दायरे में 78 विदेशी दूतावास और अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं। साथ ही, यहां 99 केंद्र सरकार के कार्यालय हैं, जहां रोजाना करीब 1.46 लाख लोग आते-जाते हैं। इसके अलावा, इस इलाके में करीब 12 हजार सरकारी और निजी घर हैं, जिनमें 64 हजार से ज्यादा लोग रहते हैं। पुलिस का तर्क है कि इतने बड़े स्तर पर भीड़ होने से एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी आपातकालीन सेवाओं के पहुंचने में भी बाधा आती है।
दिल्ली पुलिस ने 2018 के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि शांतिपूर्ण विरोध करना एक मौलिक अधिकार है, लेकिन इसे अन्य नागरिकों के अधिकारों के साथ संतुलित करना जरूरी है। पुलिस ने स्पष्ट किया कि किसी खास जगह पर विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है और सक्षम अधिकारी जरूरत पड़ने पर प्रदर्शन स्थल को बदलने का हक रखते हैं।