जंतर मंतर अब विरोध प्रदर्शन की जगह नहीं, दिल्ली पुलिस ने बदला नियम

दिल्ली के दिल में स्थित जंतर मंतर, जो दशकों से लोकतंत्र की आवाज और आम जनता के विरोध प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र रहा है, अब आधिकारिक तौर पर इस सूची से बाहर हो गया है। दिल्ली पुलिस ने एक नए आदेश के जरिए जंतर मंतर को 'डेजिग्नेटेड प्रोटेस्ट साइट' के रूप में डी-नोटिफाई कर दिया है। पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार द्वारा जारी इस आदेश के बाद अब यहां विरोध प्रदर्शन करना प्रतिबंधित होगा।
यह फैसला गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति की सिफारिशों के बाद लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त स्थानों की व्यवस्था करने को कहा था, जिसके जवाब में पुलिस ने अब तीन नए विकल्प दिए हैं। अब प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी (CBD) ग्राउंड का रुख करना होगा।
दूरी और खर्च ने बढ़ाई परेशानी
हालांकि, नए विकल्पों ने प्रदर्शनकारियों और कार्यकर्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये तीनों मैदान संसद से काफी दूर हैं। रामलीला मैदान करीब 4 किलोमीटर, सीबीडी ग्राउंड 12 किलोमीटर और बुराड़ी ग्राउंड लगभग 18 किलोमीटर दूर है। इसके अलावा, रामलीला मैदान की बुकिंग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। खबर है कि यह मैदान अगले ढाई महीने तक पहले से बुक है।
इतना ही नहीं, 12 एकड़ के इस मैदान को बुक करने के लिए भारी रकम चुकानी होगी। 50 हजार लोगों की क्षमता वाले इस ग्राउंड का किराया करीब 1.21 लाख रुपये प्रतिदिन (50 हजार किराया और 55 हजार रिफंडेबल सिक्योरिटी) है। हालांकि, 150 लोगों की क्षमता वाला एक छोटा हिस्सा मुफ्त उपलब्ध है, लेकिन बड़े आंदोलनों के लिए यह नाकाफी है।
इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में हंगामा मच गया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे सरकार की "अत्यधिक घबराहट" बताया है, वहीं समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे भाजपा की "हार" करार देते हुए कहा कि प्रशासन डर के साये में है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत डिपके का कहना है कि सरकार को जगह से नहीं, बल्कि लोगों के विरोध करने के विचार से समस्या है।
तनाव इस कदर बढ़ गया कि 13 अक्टूबर को जब सीजेपी के नेता सौरव दास, आशुतोष रंका और अजिंक्य शिंदे ने जंतर मंतर में प्रवेश की कोशिश की, तो पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। फिलहाल यह मामला अदालतों की दहलीज पर है। दिल्ली हाई कोर्ट इस प्रतिबंध पर सुनवाई करेगा, जबकि सुप्रीम कोर्ट 15 अक्टूबर को हिरासत और परिवहन प्रतिबंधों से जुड़ी याचिकाओं पर विचार करेगा।