दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शन की अनुमति खारिज की, राजधानी में सुरक्षा सख्त

राजधानी दिल्ली में 10 अक्टूबर को होने वाले एक बड़े विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को तगड़ा झटका लगा है। दिल्ली पुलिस विरोध प्रदर्शन अनुमति देने से साफ इनकार कर चुकी है। जंतर-मंतर पर प्रस्तावित इस मार्च को सुरक्षा कारणों और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के मद्देनजर प्रतिबंधित कर दिया गया है। पुलिस ने आम जनता से अपील की है कि वे इस प्रदर्शन का हिस्सा न बनें।
सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य बनाने के लिए नई दिल्ली क्षेत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू कर दी गई है। केंद्र सरकार ने 8 से 12 अक्टूबर के बीच सुरक्षा के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) की 221 कंपनियों को तैनात करने का आदेश दिया है। ये बल दिल्ली पुलिस के 15,000 जवानों के साथ मिलकर मोर्चा संभालेंगे।
अपराधियों पर नजर और डिटेंशन सेंटर की तैयारी
पुलिस प्रशासन इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहता। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन 2,873 लोगों की लिस्ट तैयार की गई है जिनका आपराधिक इतिहास रहा है और जिन्होंने पहले CJP के प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था। पुलिस ने कई कार्यकर्ताओं को नजरबंद करने और बुराड़ी व छत्रसाल स्टेडियम जैसे इलाकों को अस्थायी डिटेंशन सेंटर के रूप में इस्तेमाल करने की योजना बनाई है। सभी SHO स्तर के अधिकारियों को अपने इलाके के हिस्ट्रीशीटरों पर कड़ी नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं।
इस पूरे विवाद के केंद्र में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं। CJP नेता सौरव दास ने चुनावी रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की है। सौरव दास ने कहा कि उन्हें इस प्रतिबंध की उम्मीद थी और उन्होंने बिहार के युवाओं सहित 'जेनरेशन-जेड' को इस आंदोलन से जुड़ने का आह्वान किया है। दास का कहना है कि अगर प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर जाने से रोका गया, तो वे जहां रुकेंगे वहीं प्रदर्शन करेंगे।
दूसरी ओर, इंडिया ब्लॉक के सांसदों द्वारा भी 8 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन की योजना थी, जिसके कारण चुनाव आयोग कार्यालय और जंतर-मंतर के आसपास सुरक्षा और बढ़ा दी गई है। दिल्ली पुलिस ने स्पष्ट किया है कि जंतर-मंतर केवल उन्हीं शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए है जिन्हें पूर्व अनुमति मिली हो और जो सुप्रीम कोर्ट की 2018 की गाइडलाइन्स का पालन करते हों।