दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया हलफनामा, छात्र प्रदर्शन में अत्यधिक बल प्रयोग से किया इनकार

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलفनामा दाखिल करके जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शन के दौरान अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों को औपचारिक रूप से खारिज कर दिया है। यह प्रदर्शन 20 जुलाई 2026 को हुआ था, जिसमें संसद की तरफ मार्च निकाला गया था। पुलिस ने इस मार्च को 'गैरकानूनी सभा का अवैध कृत्य' बताया और कहा कि इसके लिए कोई अनुमति नहीं ली गई थी। इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए Delhi Police affidavit पर देख सकते हैं।
प्रमुख बिंदु:
- दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया।
- 20 जुलाई 2026 के जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा है मामला।
- पुलिस ने अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों से किया इनकार।
- संघर्ष में 240 से अधिक पुलिसकर्मी और करीब 200 नागरिक हुए थे घायल।
पुलिस कार्रवाई और बेरिकेडिंग
डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस सचिन शर्मा द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे में स्पष्ट किया गया कि अधिकारियों ने अत्यधिक बल के बजाय "कैलिब्रेटेड फोर्स" (नियोजित बल) का इस्तेमाल किया था। अधिकारियों ने बताया कि उस समय नई दिल्ली जिले में BNSS की धारा 163 (पूर्व में CrPC की धारा 144) के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन शांतिपूर्ण शुरू हुआ था लेकिन प्रदर्शनकारियों द्वारा संसद की ओर बढ़ने के लिए कई स्तरों की बैरिकेडिंग तोड़ने के बाद स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन में "असामाजिक तत्वों" और "हिस्ट्रीशीटरों" ने घुसपैठ कर ली थी।
प्रदर्शन में भीड़ और झड़प के आंकड़े
पुलिस डेटा के अनुसार, 20 जुलाई को जंतर-मंतर के आसपास 3 किलोमीटर के दायरे में 30,000 से अधिक प्रदर्शनकारी एकत्र हुए थे, जिन्हें संभालने के लिए लगभग 5,000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था। इस झड़ップ के परिणामस्वरूप 240 से अधिक पुलिसकर्मी और लगभग 200 नागरिक या प्रदर्शनकारी घायल हो गए। इस छात्र प्रदर्शन का नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने किया था, जिसमें ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन और स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के संगठन शामिल थे।
याचिकाओं पर जवाब और निगरानी तकनीक
अपने खिलाफ दायर याचिकाओं के जवाब में दिल्ली पुलिस ने तर्क दिया कि कानूनी चुनौतियां "चुनिंदा तस्वीरों, अधूरे वीडियो क्लिप और सत्यापित न की गई मीडिया व सोशल मीडिया रिपोर्टों" पर आधारित थीं, जो स्थिति के पूरे कानूनी संदर्भ को दर्शाने में विफल रहीं। सामूहिक निगरानी के आरोपों के संबंध में, पुलिस ने इस आरोप से इनकार किया लेकिन पुष्टि की कि उन्होंने मौजूदा आपराधिक रिकॉर्ड वाले 2,873 व्यक्तियों की पहचान के लिए फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक) का उपयोग किया था।