लोकतंत्र बचाने की जंग: नेहा बोरा ने सुनाया दिल्ली पुलिस के crackdown और हिरासत का अनुभव

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए किए गए प्रदर्शनों और उस दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई का ब्यौरा साझा किया। उन्होंने दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शुरू हुआ यह विरोध अब एक व्यापक नागरिक आंदोलन का रूप ले चुका है, जिसमें लोग चुनावी रोल और विरोध करने के अपने मौलिक अधिकार पर सवाल उठा रहे हैं।
नेहा बोरा ने बताया कि 25 सितंबर को नागरिकों द्वारा निकाले गए मार्च में योगेंद्र यादव, अंजली भारद्वाज, राज्यसभा सांसद मनोज झा और टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा जैसी बड़ी हस्तियों ने शिरकत की थी। उन्होंने कहा कि यह एकजुटता ठीक वैसी ही थी जैसी पिछले कुछ महीनों में शिक्षा आंदोलनों के दौरान देखी गई थी। इसके बाद 2 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर मंतर और मुंबई में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए, जिसने यह संदेश दिया कि वोटों की चोरी और लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ अब नागरिकों के लिए सबसे गंभीर मुद्दा बन गया है।
हिरासत और पुलिस कार्रवाई का आरोप
दिल्ली में हुए प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए नेहा बोरा ने गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि 2 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान लगभग 1,000 लोगों को हिरासत में लेकर दिल्ली के अलग-अलग पुलिस थानों में भेज दिया गया। इसके बावजूद लोग 3 अक्टूबर को फिर सड़कों पर उतरे, जहां उन्हें एक बार फिर हिरासत और पाबंदियों का सामना करना पड़ा।
4 अक्टूबर को इंडिया गेट से जंतर मंतर तक निकाले गए मार्च के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि करीब 3,000 लोग शामिल हुए थे, लेकिन पुलिस ने चुनिंदा तरीके से प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाया। नेहा ने अपनी हिरासत का अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्हें एक निजी वाहन में अलग कर दिया गया था और उनके साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे अन्य प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने धक्का देकर बाहर निकाल दिया। उन्होंने बताया कि उस गाड़ी में वह अकेली प्रदर्शनकारी थीं और बाकी सभी पुलिसकर्मी थे।
नेहा ने आगे बताया कि इस दौरान अन्य प्रदर्शनकारियों ने उस वाहन को करीब एक घंटे तक रोक कर रखा। कुछ महिलाएं गाड़ी की छत पर चढ़ गईं और कुछ उसके आगे बैठ गईं। नेहा के अनुसार, यह विरोध किसी व्यक्ति के प्रति वफादारी नहीं, बल्कि आम लोगों का लोकतंत्र को बचाने के लिए एक सामूहिक प्रयास था। उन्होंने चुनावी रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पर भी चिंता जताई और दावा किया कि इससे करीब 13 करोड़ लोग अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।