बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर दिल्ली-NCR में बड़ा अभियान, विशेषज्ञों ने बताए खतरे के संकेत

दिल्ली-NCR में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए अब बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों को समय रहते पहचानने और उन्हें सही मदद दिलाने के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों, स्कूलों और सरकारी संस्थाओं ने हाथ मिलाया है। इस मुहिम का मुख्य उद्देश्य बच्चों में मानसिक तनाव, ऑटिज्म और अन्य भावनात्मक समस्याओं की शुरुआती पहचान करना है ताकि समय रहते उनका इलाज संभव हो सके।
दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (DCPCR) ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए एक विशेष सत्र का आयोजन किया। इस सत्र में IHBAS की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. शहजादी मल्होत्रा ने बताया कि बच्चे के भावनात्मक विकास के लिए घर का सकारात्मक माहौल कितना जरूरी है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया कि वे बच्चों में ऑटिज्म और मानसिक बीमारी के शुरुआती लक्षणों को कैसे पहचानें।
इन संकेतों को न करें नजरअंदाज, हो सकती है मानसिक परेशानी
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चे अक्सर अपनी परेशानी शब्दों में नहीं कह पाते, इसलिए उनके व्यवहार पर नजर रखना जरूरी है। नोएडा के मदरहुड हॉस्पिटल्स के सीनियर कंसल्टेंट पीडियाट्रिशियन डॉ. अमित गुप्ता के अनुसार, जब बच्चे भावनात्मक तनाव में होते हैं, तो उनकी भूख, नींद और मूड में अचानक बदलाव आने लगता है। वहीं, आकाश हेल्थकेयर की डॉ. मीना जे. ने कहा कि इन सूक्ष्म बदलावों की समय पर पहचान ही सही इलाज की कुंजी है।
माता-पिता को सलाह दी गई है कि यदि बच्चा अचानक बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो गया है, लोगों से दूरी बना रहा है, बिना वजह घबरा रहा है या उसे बार-बार सिरदर्द और पेट दर्द की शिकायत हो रही है, तो इसे सामान्य न मानकर विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।
शिक्षा के क्षेत्र में भी बदलाव दिख रहे हैं। नोएडा के इंद्रप्रस्थ ग्लोबल स्कूल ने 'लाइफस्माइल' के साथ मिलकर 'ब्लू कोड' और 'पिंक कोड' वर्कशॉप आयोजित की, ताकि छात्र अपनी भावनाओं और व्यक्तिगत सीमाओं (Personal Boundaries) को समझ सकें। इसी तरह लिटिल फ्लावर्स पब्लिक स्कूल ने भी छात्रों के लिए एक सहायक भावनात्मक माहौल तैयार करने की पहल की है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे पर काम हो रहा है। शिक्षा मंत्रालय एक ड्राफ्ट स्कूल मानसिक स्वास्थ्य नीति की समीक्षा कर रहा है, जिसके तहत शिक्षकों को तनाव, चिंता और अवसाद की पहचान करने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। इस नीति में माइंडफुलनेस और भारतीय ज्ञान प्रणालियों को स्कूल की गतिविधियों में शामिल करने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही, 'साइकीकेयर' जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म भी अब ऑनलाइन माध्यम से परिवारों तक मनोवैज्ञानिक सहायता पहुँचाने का काम कर रहे हैं।