बेटे को घर से निकालने के लिए सुरक्षा को खतरा होना जरूरी: दिल्ली हाई कोर्ट

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में यह साफ कर दिया है कि माता-पिता अपने बेटे को घर से केवल इसलिए बाहर नहीं निकाल सकते क्योंकि उनके बीच अनबन है। कोर्ट ने कहा है कि बेटे को बेदखल करने के लिए यह साबित करना जरूरी होगा कि उसकी वजह से माता-पिता की सुरक्षा या सेहत को कोई वास्तविक खतरा है।
यह फैसला 21 अक्टूबर, 2026 को सुनाया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि संपत्ति केवल माता-पिता का घर नहीं है और बेटा उसमें एक सह-साझेदार (co-sharer) के रूप में पहचाना जाता है, तो सिर्फ उत्पीड़न के आरोपों के आधार पर बेदखली की कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती।
सीनियर सिटीजन एक्ट और अधिकारों का संतुलन
अदालत ने इस मामले में 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' और 2009 के नियमों का हवाला दिया। कोर्ट ने माना कि जिला मजिस्ट्रेट के पास बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए अधिकार हैं, लेकिन इन शक्तियों का इस्तेमाल केवल वास्तविक संकट और दुर्व्यवहार के मामलों में ही होना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने पहले भी बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा के लिए बच्चों की बेदखली को वैध ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी अगस्त और सितंबर 2026 में यह पुष्टि की थी कि ट्रिब्यूनल के पास वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए बेदखली का आदेश देने का अधिकार है।
हालांकि, ताजा फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि सुरक्षा से समझौता नहीं हुआ है और संपत्ति के अधिकार साझा हैं, तो बेटे की मौजूदगी मात्र बेदखली का आधार नहीं बन सकती। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान से जीने के अधिकार और संपत्ति के सह-स्वामियों के कानूनी संरक्षण के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश है।