Delhi High Court का बड़ा फैसला: खुले नाले में बच्चे की मौत पर सरकार और DJB को ठहराया जिम्मेदार, मिलेगा 17 लाख मुआवजा

दिल्ली और एनसीआर के पाठकों के लिए एक बेहद जरूरी और बड़ी खबर सामने आई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने 12 साल पुराने एक दर्दनाक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड (DJB) को जिम्मेदार ठहराया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि 10 साल के मासूम मोहम्मद नाजिम के माता-पिता को लगभग 17 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए। यह पूरी घटना दिल्ली में लापरवाही का एक बड़ा उदाहरण है, जिसने प्रशासन की पोल खोल कर रख दी है। आइए जानते हैं इस मामले की पूरी और जरूरी बातें:
* दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार और DJB को माना जिम्मेदार।
* 10 साल के बच्चे मोहम्मद नाजिम की खुले नाले में डूबने से हुई थी मौत।
* पीड़ित परिवार को 17 लाख रुपये मुआवजा और 9% ब्याज देने का आदेश।
* अधिकारियों की लापरवाही और 'ब्लेम गेम' पर कोर्ट ने जताई कड़ी नाराजगी।
कैसे हुआ था यह दर्दनाक हादसा
दिल्ली के भागीरथी विहार नहर के पास 27 सितंबर 2014 को एक दर्दनाक हादसा हुआ था, जब 10 साल का मासूम मोहम्मद नाजिम एक खुले और बिना ढक्कन वाले सीवर यानी नाले में गिर गया था। इस हादसे में बच्चे की जान चली गई थी, जिसे लेकर परिवार ने कोर्ट में न्याय की गुहार लगाई थी। इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मिनी पुष्कर्ण ने अपने फैसले में कहा कि यह घटना सिविल एडमिनिस्ट्रेशन की बुनियादी नाकामी और सरकारी अधिकारियों की बहुत बड़ी लापरवाही को दिखाती है। कोर्ट ने साफ कहा कि रिहायशी इलाके में इस तरह खुला हुआ गड्ढा होना सीधे तौर पर अधिकारियों की लापरवाही का साफ सबूत है।
अधिकारियों की लापरवाही और कोर्ट की फटकार
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने अधिकारियों पर जमकर गुस्सा निकाला। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से भागने के लिए सिर्फ 'एक-दूसरे पर आरोप लगाने का खेल' (ब्लेम गेम) खेल रहे थे। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के साल 2010 के उन दिशा-निर्देशों का भी जिक्र किया, जिनमें खतरनाक कुओं और गड्ढों को सुरक्षित रखने के स्पष्ट आदेश दिए गए थे, लेकिन अधिकारियों ने इसकी परवाह नहीं की। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मिलने वाले 'जीवन के अधिकार' को किसी भी अधिकारी की लापरवाही या उदासीनता के कारण नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
मुआवजे और रिकवरी को लेकर क्या कहा कोर्ट ने
29 जुलाई 2026 को आए इस फैसले में कोर्ट ने आदेश दिया है कि पीड़ित माता-पिता को 16.92 लाख रुपये (लगभग 17 लाख रुपये) का मुआवजा दिया जाए। इस रकम पर याचिका दायर करने की तारीख से 9 प्रतिशत साधारण ब्याज भी देना होगा। हालांकि, कोर्ट ने दिल्ली सरकार और DJB को यह छूट दी है कि वे चाहें तो इस मुआवजे की रकम को अन्य जिम्मेदार एजेंसियों यानी प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) और प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर M/s DSCL-Fengshun-Wabag कंसोर्टियम से कानूनी प्रक्रिया के जरिए वसूल सकते हैं।