पत्रकारों के खिलाफ SC/ST एक्ट जांच पर रोक से दिल्ली हाई कोर्ट का इनकार

दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दो पत्रकारों और एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एफआईआर की जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। यह मामला एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह पुलिस को जांच आगे बढ़ाने से रोकने का आदेश नहीं दे सकता।
पूरा मामला कनॉट प्लेस सब-डिवीजन में तैनात एसीपी विवेक भगत की शिकायत से शुरू हुआ। अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले एसीपी भगत का आरोप है कि 3 अक्टूबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ हो रहे एक विरोध प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों ने उनके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया, उनकी नियुक्ति पर सवाल उठाए और सरकारी काम में बाधा डाली। जस्टिस मिनी पुष्करणा ने इस मामले की सुनवाई की और अब अगली सुनवाई दशहरा की छुट्टियों के बाद तय की गई है।
काउन्टर ब्लास्ट और यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप
अदालत में आरोपी पत्रकारों की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता तनवीर अहमद मीर ने दलील दी कि एसीपी द्वारा दर्ज यह मामला दरअसल एक 'काउन्टर ब्लास्ट' है। उन्होंने तर्क दिया कि यह कार्रवाई एक महिला पत्रकार द्वारा एसीपी के खिलाफ दर्ज कराई गई यौन उत्पीड़न और बदसलूकी की शिकायत के जवाब में की गई है। हालांकि, महिला पत्रकार की शिकायत पर अभी तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई है और उसकी जांच जारी है।
इस हाई-प्रोफाइल विवाद में अब सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग की एंट्री हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महिला पत्रकार को अंतरिम सुरक्षा प्रदान करते हुए दिल्ली पुलिस को उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न करने का निर्देश दिया है। वहीं, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस पूरे घटनाक्रम का स्वतः संज्ञान लिया है और दिल्ली पुलिस कमिश्नर से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
इस मामले में एक और नया मोड़ तब आया जब दिल्ली पुलिस ने 24 वर्षीय एक स्वतंत्र पत्रकार को गिरफ्तार किया। उस पर आरोप है कि उसने एसीपी विवेक भगत का एक आपत्तिजनक एआई-जनरेटेड (AI-generated) वीडियो बनाया और उसे प्रसारित किया। फिलहाल, हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद पुलिस अब बिना किसी रोक के अपनी जांच जारी रख सकेगी।