बरी हो चुके लोगों के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, अब मिलेगा 'Right to Be Forgotten'

कल्पना कीजिए कि सालों पहले आप पर कोई आरोप लगा था, लेकिन कोर्ट ने आपको निर्दोष पाया और केस खत्म कर दिया। लेकिन जब भी कोई आपका नाम गूगल पर सर्च करता है, तो वह पुराना केस सामने आ जाता है, जो आपकी वर्तमान छवि और करियर को प्रभावित करता है। अब दिल्ली हाई कोर्ट ने ऐसे लोगों को बड़ी राहत देते हुए right to be forgotten (भूल जाने का अधिकार) को मान्यता दी है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया गया है, तो ऑनलाइन न्यायिक रिकॉर्ड में उसका नाम बने रहना उसकी प्राइवेसी यानी निजता के अधिकार का उल्लंघन है। जस्टिस अमित महाजन ने 16 अक्टूबर 2026 को दिए अपने आदेश में कहा कि बरी हो चुके व्यक्तियों को पुराने आरोपों की वजह से जीवन भर पूर्वाग्रह का सामना नहीं करना चाहिए। इसी के तहत कोर्ट ने आदेश दिया है कि ऐसे दस्तावेज़ों में पहचान बताने वाली जानकारियों को मास्क (छुपाया) किया जाए।
प्राइवेसी का अधिकार और कानूनी ढांचा
यह फैसला अचानक नहीं आया है, बल्कि इसके पीछे एक लंबी कानूनी प्रक्रिया है। इससे पहले 29 मई 2026 को जस्टिस सचिन दत्ता ने एक विस्तृत फ्रेमवर्क तैयार किया था, जिसमें सर्च इंजन से न्यायिक रिकॉर्ड को डी-इंडेक्स करने और डिजिटल दस्तावेजों में पहचान छिपाने की बात कही गई थी। यह पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के 2017 के उस ऐतिहासिक फैसले (के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ) पर आधारित है, जिसमें प्राइवेसी को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार माना गया था।
भारत में फिलहाल 'भूल जाने के अधिकार' के लिए कोई अलग से कानून नहीं है, लेकिन अदालतें प्राइवेसी और जनता के सूचना के अधिकार के बीच संतुलन बना रही हैं। इसी वजह से गूगल और 'इंडियन कानून' जैसे कानूनी डेटाबेस को अक्सर निर्देश दिए जाते हैं कि वे बरी हो चुके याचिकाकर्ताओं की पहचान को सीमित करें ताकि उनकी गरिमा बनी रहे।
गौरतलब है कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 को भी लागू किया जा रहा है, जिसमें 7 अक्टूबर 2026 को कुछ और संशोधन किए गए थे। इस कानून का पूर्ण कार्यान्वयन 13 मई 2027 तक होने की उम्मीद है। हालांकि, जब तक कोई विशेष कानून नहीं आता, तब तक न्यायपालिका संवैधानिक अधिकारों के जरिए नागरिकों की प्राइवेसी की रक्षा कर रही है।