पब्लिक प्रोसिक्यूटर की कमी एक स्थायी संकट, दिल्ली हाई कोर्ट ने जताई नाराजगी
दिल्ली हाई कोर्ट ने पब्लिक प्रोसिक्यूटर की भारी कमी पर नाराजगी जताई है, जिससे आपराधिक मुकदमों और जमानत प्रक्रियाओं में देरी हो रही है।

दिल्ली की अदालतों में आपराधिक मामलों की सुनवाई और जमानत प्रक्रियाओं में हो रही देरी ने अब न्यायपालिका को सोचने पर मजबूर कर दिया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने राज्य में पब्लिक प्रोसिक्यूटर की भारी कमी को एक "स्थायी समस्या" (perennial problem) करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी वकीलों की अनुपलब्धता के कारण न केवल ट्रायल प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि यह पूरी कानूनी प्रक्रिया के लिए एक बड़ा संकट बन गया है।
27 अक्टूबर 2026 को हुई एक सुनवाई के दौरान जस्टिस गिरीश कथपालिया ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार के ढुलमुल रवैये की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि पदों की रिक्तियों को भरने के लिए अब तक कोई गंभीर कदम नहीं उठाए गए हैं। इसी सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने तीस हजारी कोर्ट के एक एडिशनल सेशन जज द्वारा दिल्ली के अभियोजन निदेशक (Director of Prosecution) मकसूद अहमद की सैलरी से 5,000 रुपये का जुर्माना वसूलने पर रोक लगा दी। यह जुर्माना एक प्रोसिक्यूटर की कोर्ट में अनुपस्थिति के कारण लगाया गया था। हाई कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब व्यक्तिगत कदाचार का कोई सबूत नहीं है, तो अधिकारी पर वित्तीय जिम्मेदारी क्यों डाली जाए, हालांकि राज्य पर लगाए गए जुर्माने को बरकरार रखा गया क्योंकि सुधार के कोई ठोस सबूत नहीं मिले।
खाली पड़े पद और बढ़ती मुश्किलें
सरकारी वकीलों की यह किल्लत कोई नई बात नहीं है और आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं। दिल्ली प्रोसिक्यूटर वेलफेयर एसोसिएशन (DPWA) के जुलाई 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, पब्लिक, एडिशनल और असिस्टेंट पब्लिक प्रोसिक्यूटर के कुल 507 स्वीकृत पदों में से केवल 257 पद ही भरे हुए थे। इसका मतलब है कि आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं।
अदालतों में इस समस्या का असर साफ दिख रहा है। इससे पहले दिसंबर 2023 में तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन ने भी टिप्पणी की थी कि प्रोसिक्यूटरों की अनुपस्थिति की वजह से जज खाली बैठे रहते हैं। वहीं, मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी चेतावनी दी थी कि इस कमी के कारण ट्रायल में देरी होती है, जिससे आरोपियों को आसानी से जमानत मिल जाती है या वे फरार होने का मौका पा लेते हैं।
कानूनी प्रावधानों के अनुसार, पब्लिक प्रोसिक्यूटर के लिए सात साल और स्पेशल प्रोसिक्यूटर के लिए दस साल का अनुभव अनिवार्य है। कोर्ट ने अब राज्य सरकार से इस पूरे मामले पर एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट मांगी है, जिसे 3 फरवरी 2027 तक जमा करना होगा।