दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों से बढ़ रही मुसीबत, हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

राजधानी दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के कारण आम जनता को होने वाली ट्रैफिक जाम की समस्या और व्यापारियों को होने वाले भारी नुकसान पर दिल्ली हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने दो जनहित याचिकाओं (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार से इस मामले में उनकी आधिकारिक प्रतिक्रिया मांगी है। अदालत का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विरोध प्रदर्शनों के जरिए अपनी बात कहने के अधिकार और शहर की व्यवस्था के बीच एक संतुलन बना रहे।
अदालत की इस बेंच में एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस संजय शर्मा शामिल थे। याचिकाओं में मांग की गई है कि दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों को विनियमित किया जाए ताकि ट्रैफिक और स्थानीय व्यापारिक गतिविधियों में कोई बड़ी बाधा न आए। याचिकाओं का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों और दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर नंबर 10/2018 का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए, जो विरोध प्रदर्शनों के प्रबंधन के लिए बनाए गए हैं।
व्यापारियों को हुआ करोड़ों का नुकसान, कोर्ट में गूंजी आवाज
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट सचिन पुरी ने एक व्यापारी की ओर से दलील पेश की। उन्होंने कोर्ट को बताया कि बार-बार होने वाले विरोध प्रदर्शनों की वजह से व्यापारियों को भारी आर्थिक चोट पहुंची है। विशेष रूप से त्योहारी सीजन के दौरान इन प्रदर्शनों के कारण व्यापार में करीब 2000 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया है। वहीं, एक अन्य याचिका अधिवक्ता ऋषभ सक्सेना द्वारा दायर की गई है, जिसमें 'मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ' और 'अमित साहनी बनाम पुलिस कमिश्नर' जैसे सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों को लागू करने की मांग की गई है।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इस विषय से जुड़े कुछ मामले पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, जिसकी अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होनी है। हाई कोर्ट ने अब इस मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 के लिए तय की है।
गौरतलब है कि यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने जंतर मंतर को विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में डी-नोटिफाई कर दिया है और अब रामलीला मैदान व बुराड़ी जैसे स्थानों का सुझाव दिया गया है। इसके अलावा, पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों के लिए भीड़ नियंत्रण के दौरान बॉडी-वर्न कैमरा अनिवार्य करने की मांग वाली एक अलग याचिका भी हाई कोर्ट में दाखिल की गई है।