लिंक्डइन अकाउंट रिस्ट्रिक्शन मामला: दिल्ली हाई कोर्ट ने रिट याचिका खारिज की
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि लिंक्डइन एक निजी कंपनी है, इसलिए अकाउंट रिस्ट्रिक्शन के मामले में रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन (LinkedIn) पर अकाउंट रिस्ट्रिक्शन को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लिंक्डइन जैसी निजी कंपनियां किसी सार्वजनिक कार्य या सरकारी ड्यूटी का निर्वहन नहीं करती हैं, इसलिए उनके खिलाफ आर्टिकल 226 के तहत रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती। यह आदेश मयंक जैन द्वारा दायर एक याचिका को खारिज करते हुए दिया गया है, जिसमें उन्होंने अपने अकाउंट पर लगी पाबंदियों को चुनौती दी थी।
निजी कंपनी पर लागू नहीं होगा रिट क्षेत्राधिकार
जस्टिस अमित महाजन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि हालांकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सार्वजनिक चर्चा और संचार का एक बड़ा जरिया हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे सरकारी कार्य कर रहे हैं। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि किसी निजी संस्था को रिट क्षेत्राधिकार के दायरे में तभी लाया जा सकता है जब वह कोई ऐसा कार्य कर रही हो जो मौलिक रूप से सरकारी हो या कानून द्वारा अनिवार्य हो।
अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि लिंक्डइन की सेवाएं स्वैच्छिक और यूजर-ड्रिवन हैं, न कि किसी सार्वजनिक कर्तव्य के तहत अनिवार्य। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि यदि वह इस मामले में कानूनी राहत चाहते हैं, तो वे सिविल सूट (दीवानी मुकदमा) दाखिल कर सकते हैं या हर्जाने की मांग कर सकते हैं, लेकिन रिट याचिका इसका सही रास्ता नहीं है।
गौरतलब है कि यह फैसला मेटा और इंस्टाग्राम जैसे अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के पिछले न्यायिक उदाहरणों के अनुरूप है, जहां अदालतों ने पहले भी माना है कि अकाउंट मैनेजमेंट से जुड़े आंतरिक फैसले रिट याचिका के दायरे से बाहर होते हैं।