इंस्टाग्राम अकाउंट सस्पेंशन: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म देना कोई 'पब्लिक ड्यूटी' नहीं
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म देना कोई सार्वजनिक कर्तव्य नहीं है, इसलिए मेटा के खिलाफ रिट याचिका मान्य नहीं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए आज दुनिया भर में सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है और जनमत तैयार किया जाता है, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि ये कंपनियां सरकारी संस्थाओं की तरह जवाबदेह हैं? दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में इस सवाल का जवाब देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल संचार और सामाजिक मेलजोल के लिए प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराना किसी सरकारी कार्य या सार्वजनिक कर्तव्य (पब्लिक ड्यूटी) के दायरे में नहीं आता।
यह मामला सार्थक भगत नाम के एक व्यक्ति की याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने अपना इंस्टाग्राम अकाउंट बिना किसी पूर्व नोटिस या जवाब देने का मौका मिले बंद (डिसेबल) किए जाने को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि मेटा प्लेटफॉर्म्स इंडिया ने उनके अकाउंट को नियमों का उल्लंघन बताकर बंद कर दिया और रिव्यू की अपील के बावजूद अकाउंट बहाल नहीं किया गया। उन्होंने इस मामले को लेकर कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।
निजी कंपनी पर रिट क्षेत्राधिकार लागू नहीं
जस्टिस अमित महाजन ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि भले ही इंस्टाग्राम सार्वजनिक चर्चाओं और सूचनाओं के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाता हो, लेकिन इसका प्राथमिक काम अभिव्यक्ति के लिए एक मंच देना है। कोर्ट ने साफ किया कि मेटा प्लेटफॉर्म्स इंडिया को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार के अधीन नहीं लाया जा सकता, क्योंकि कंपनी कोई ऐसा पारंपरिक सरकारी कार्य नहीं कर रही है जिसे राज्य ने उसे सौंपा हो।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, "प्रतिवादी (मेटा) न तो किसी सार्वजनिक कर्तव्य के निर्वहन के लिए ऐसा प्लेटफॉर्म प्रदान करने के लिए बाध्य है और न ही कानूनी रूप से अपनी सेवाएं देने के लिए मजबूर है। इसकी सेवाएं स्वैच्छिक और यूजर-ड्रिवन हैं।" अदालत ने सुझाव दिया कि यदि याचिकाकर्ता को निजी कंपनी से कोई शिकायत है, तो वह सिविल सूट के जरिए हर्जाने की मांग कर सकता है।
वहीं, भारत सरकार के खिलाफ राहत देने से इनकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिका में यह साबित नहीं हो पाया कि सरकार ने अपने किसी वैधानिक कर्तव्य की अनदेखी की है। हालांकि, याचिकाकर्ता ने शिकायत की थी कि 'ग्रीवेंस अपीलेट कमेटी' (Grievance Appellate Committee) के पास उनकी अपील 30 दिन बीत जाने के बाद भी लंबित है। इस पर संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने कमेटी को निर्देश दिया कि वह इस अपील पर जल्द से जल्द फैसला ले। इसके साथ ही कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।