सड़क हादसे में पैर गंवाने वाली बुजुर्ग महिला को दिल्ली हाई कोर्ट ने दिलाया ज्यादा मुआवजा

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील फैसला सुनाते हुए एक 81 वर्षीय बुजुर्ग महिला के लिए मुआवजे की राशि में बढ़ोतरी की है। यह मामला एक सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें महिला ने अपना पैर गंवा दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि घर संभालने वाली महिलाओं के काम की कीमत सिर्फ इसलिए कम नहीं हो जाती क्योंकि वे किसी कंपनी में नौकरी नहीं करतीं या उनकी कोई सैलरी नहीं होती।
दरअसल, इस मामले में मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) ने पहले महिला को 14.42 लाख रुपये का मुआवजा दिया था। ट्रिब्यूनल ने उनकी आय और भविष्य की कमाई के नुकसान के लिए कोई पैसा देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि उनके पास औपचारिक रोजगार का कोई प्रमाण नहीं था। इस फैसले के खिलाफ मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां जस्टिस अनीश दयाल की सिंगल बेंच ने ट्रिब्यूनल के फैसले को पलट दिया और मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 20.79 लाख रुपये कर दिया। यानी महिला को अब 6.37 लाख रुपये अतिरिक्त मिलेंगे।
घरेलू काम की अहमियत को कोर्ट ने माना
जस्टिस अनीश दयाल ने अपने फैसले में एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि एक होममेकर (गृहिणी) द्वारा परिवार की देखभाल और उनके द्वारा किए गए बिना वेतन वाले काम की आर्थिक वैल्यू उम्र बढ़ने के साथ कम नहीं होती। कोर्ट ने टिप्पणी की कि बुजुर्ग महिलाएं घर में एक ऐसा भावनात्मक सहारा प्रदान करती हैं, जिसे किसी सैलरी या पैसों से नहीं मापा जा सकता।
कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि अक्सर माता-पिता इसलिए अपने करियर या बिजनेस पर ध्यान दे पाते हैं क्योंकि दादी-नानी अपने पोते-पोतियों की देखभाल की जिम्मेदारी उठाती हैं। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि बुजुर्ग महिलाओं की भूमिका को लेकर उम्र आधारित धारणाएं रखना एक तरह का पूर्वाग्रह और स्टीरियोटाइप है। इसी आधार पर कोर्ट ने घरेलू भूमिका की आंतरिक कीमत को स्वीकार करते हुए मुआवजे की राशि बढ़ाई, जिसे निचली अदालत ने नजरअंदाज कर दिया था।