दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: RTI के जरिए नई जानकारी तैयार करने के आदेश को किया रद्द
दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि RTI एक्ट के तहत अधिकारियों को नई जानकारी तैयार करने या संकलित करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

दिल्ली हाई कोर्ट ने सूचना के अधिकार (RTI) की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के 2011 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें जन सूचना अधिकारी (PIO) को उन मामलों का विवरण जुटाने और सार्वजनिक करने के लिए कहा गया था, जिनमें फैसले सुनाने में दो महीने से ज्यादा की देरी हुई थी।
यह पूरा मामला साल 2009 में शुरू हुआ था, जब एक पूर्व न्यायिक अधिकारी पी.डी. गुप्ता ने RTI आवेदन दाखिल किया था। उन्होंने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस ए.के. सिकरी द्वारा सुने गए उन मामलों की जानकारी मांगी थी, जिनमें निर्णय सुरक्षित होने के बाद समय पर नहीं सुनाए गए थे। गुप्ता ने अपने आवेदन में 2007-2008 के एक व्यक्तिगत अनुभव का हवाला दिया था।
RTI एक्ट की सीमाओं पर कोर्ट की टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अमित महाजन ने स्पष्ट किया कि RTI एक्ट, 2005 अधिकारियों को केवल वही जानकारी देने के लिए बाध्य करता है जो पहले से रिकॉर्ड में मौजूद हो। कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत किसी भी सार्वजनिक संस्था को ऐसी जानकारी बनाने, इकट्ठा करने या संकलित करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उनके पास पहले से उपलब्ध नहीं है।
कोर्ट ने यह भी बताया कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट की 'अनिल राय' गाइडलाइंस के तहत कोर्ट मास्टर्स हर महीने सुरक्षित फैसलों की सूची चीफ जस्टिस को सौंपते हैं, लेकिन इन दस्तावेजों को जज के नाम पर अलग से संकलित कर रखना जरूरी नहीं है।
जस्टिस महाजन ने पाया कि CIC ने इस गलत धारणा पर काम किया कि ऐसी जानकारी आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए, जबकि PIO ने अपने हलफनामे में साफ कर दिया था कि उनके पास ऐसा कोई संकलित डेटा मौजूद नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने PIO की याचिका को स्वीकार करते हुए CIC के पुराने आदेश को खारिज कर दिया।