यूनिफॉर्म के बदले कैश ट्रांसफर: दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार के फैसले पर लगाई मुहर
दिल्ली हाईकोर्ट ने EWS छात्रों को यूनिफॉर्म के बदले कैश देने के सरकार के फैसले को सही ठहराया और रिव्यू पिटीशन खारिज की।

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सरकार की उस नीति को सही ठहराया है, जिसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित समूह (DG) के छात्रों को स्कूल यूनिफॉर्म के बजाय सीधे नकद राशि (Cash Transfer) दी जा रही है। कोर्ट ने इस नीति को चुनौती देने वाली एक रिव्यू पिटीशन को खारिज कर दिया है, जिससे अब छात्रों को मिलने वाली इस वित्तीय सहायता का रास्ता साफ हो गया है।
जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद और जस्टिस रेनू भटनागर की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतें आमतौर पर सरकार के नीतिगत फैसलों में तब तक हस्तक्षेप नहीं करतीं, जब तक कि वे फैसले पूरी तरह से मनमाने या तर्कहीन न हों। कोर्ट के अनुसार, सरकार का यह फैसला न्यायिक विवेक को झकझोरने वाला या गलत नहीं है।
क्यों बदला गया यूनिफॉर्म देने का तरीका?
दिल्ली सरकार ने 10 जून 2025 को अपनी इस नीति में बदलाव किया था। सरकार का तर्क था कि पहले की तरह यूनिफॉर्म खरीदकर, उनका नाप लेकर और फिर उन्हें बांटने की प्रक्रिया में काफी व्यावहारिक मुश्किलें आती थीं। अक्सर यह काम शैक्षणिक सत्र शुरू होने तक पूरा नहीं हो पाता था, जिससे छात्र परेशान होते थे। इन बाधाओं को दूर करने के लिए सरकार ने डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर (DBT) का रास्ता चुना।
इस नई व्यवस्था के तहत सरकारी, सहायता प्राप्त स्कूलों और निजी स्कूलों में फ्री शिप कोटा के तहत पढ़ने वाले छात्रों को आर्थिक मदद दी जा रही है। काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स द्वारा तय की गई दरों के अनुसार:
- कक्षा 1 से 5 तक के छात्रों के लिए: ₹1,250
- कक्षा 6 से 8 तक के छात्रों के लिए: ₹1,500
- कक्षा 9 से 12 तक के छात्रों के लिए: ₹1,700
इस बदलाव को 'जस्टिस फॉर ऑल' नामक एनजीओ ने चुनौती दी थी, लेकिन कोर्ट ने इसे शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 और दिल्ली RTE नियमों, 2011 के अनुरूप पाया। कोर्ट ने गौर किया कि नियमों में यूनिफॉर्म उपलब्ध कराने की बात कही गई है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है कि वह केवल भौतिक रूप (In-kind) में ही दी जाए। अदालत ने माना कि कैश ट्रांसफर एक व्यावहारिक समाधान है, जिससे छात्रों को समय पर संसाधन मिल सकेंगे।