जम्मू-कश्मीर आतंकी साजिश मामला: दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखी आरोपी की जमानत, NIA की याचिका खारिज
जम्मू-कश्मीर आतंकी साजिश मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने आरोपी मतीन अहमद भाट की जमानत बरकरार रखी और NIA की याचिका खारिज कर दी।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और अशांति फैलाने की एक बड़ी साजिश से जुड़े मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आरोपी मतीन अहमद भाट को मिली जमानत को बरकरार रखते हुए नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) की अपील को खारिज कर दिया है। जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस अरुण भारद्वाज की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट ने जमानत देने से पहले यूएपीए (UAPA) के तहत जरूरी पाबंदियों और सबूतों का उचित मूल्यांकन किया था।
यह पूरा मामला प्रतिबंधित आतंकी संगठनों की गतिविधियों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए कश्मीर में अस्थिरता पैदा करने की एक बड़ी साजिश से जुड़ा है। NIA का आरोप था कि कई आरोपी 'हाइब्रिड कैडर' या 'लोन वुल्फ' ऑपरेटर्स के रूप में काम कर रहे थे और पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स द्वारा संचालित प्रोपेगेंडा ग्रुप्स से जुड़े थे। मतीन अहमद भाट पर आरोप था कि उसने ओवर ग्राउंड वर्कर (OGW) के तौर पर काम किया, हथियारों की आवाजाही में मदद की और स्थानीय युवाओं को आतंकी संगठनों में भर्ती करने में सहायता की।
सबूतों की कमी और कोर्ट की टिप्पणी
करीब दो साल पहले अक्टूबर 2021 में गिरफ्तार किए गए भाट को मई 2023 में ट्रायल कोर्ट ने जमानत दे दी थी। कोर्ट ने पाया था कि उस स्तर पर ऐसे पर्याप्त सबूत नहीं थे जो यह साबित करें कि आरोपी आतंकी संगठनों की बैठकों में शामिल था या उसने हथियारों का इस्तेमाल किया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि आरोपी का किसी प्रत्यक्ष आतंकी कृत्य से सीधा संबंध नहीं मिला है।
NIA ने इस जमानत का विरोध करते हुए तर्क दिया था कि ट्रायल कोर्ट ने सबूतों का सही आकलन नहीं किया और डिजिटल साक्ष्यों व कॉल रिकॉर्ड्स को नजरअंदाज किया। हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि जमानत के खिलाफ अपील का दायरा सीमित होता है और हस्तक्षेप तभी किया जाता है जब आदेश पूरी तरह अवैध या मनमाना हो। कोर्ट ने माना कि चूंकि ट्रायल पूरा होने में अभी काफी समय लगेगा और गवाहों की संख्या ज्यादा है, इसलिए आरोपी को जमानत पर रखना उचित है।
हाई कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि उसके और ट्रायल कोर्ट के ये अवलोकन केवल जमानत की प्रक्रिया के लिए हैं और इनका प्रभाव मुख्य मुकदमे (Trial) पर नहीं पड़ेगा।