प्रॉसीक्यूशन डायरेक्टर की सैलरी से रिकवरी पर दिल्ली HC की रोक, वकीलों की कमी पर जताई चिंता
दिल्ली हाई कोर्ट ने अभियोजन निदेशक की सैलरी से 5000 रुपये की वसूली पर रोक लगाई और शहर में सरकारी वकीलों की कमी पर चिंता जताई।

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ट्रायल कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें दिल्ली के अभियोजन निदेशक (Director of Prosecution) मकसूद अहमद की सैलरी से 5,000 रुपये की लागत वसूलने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी अधिकारी के खिलाफ कदाचार या गलत इरादे से काम करने का कोई ठोस सबूत न हो, तब तक उसकी व्यक्तिगत सैलरी पर वित्तीय बोझ डालना उचित नहीं है।
यह पूरा मामला तीस हजारी कोर्ट के एक एडिशनल सेशन जज के आदेश से शुरू हुआ। 6 अक्टूबर को एक सुनवाई के दौरान सुबह 11:30 बजे तक कोई भी सरकारी वकील पेश नहीं हुआ था। इस बात से नाराज होकर ट्रायल कोर्ट ने राज्य पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि अभियोजन निदेशक की सैलरी से वसूली जाए। इस आदेश को चुनौती देते हुए मकसूद अहमद दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे थे।
सरकारी वकीलों की 'पुरानी' कमी पर कोर्ट सख्त
जस्टिस गिरीश कथपालिया ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह आदेश वास्तव में न्यायाधीश की उस हताशा को दर्शाता है, जो वे मुकदमों के भारी बोझ और बेल याचिकाओं के जल्द निपटारे के दबाव के कारण महसूस करते हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि राज्य पर जुर्माना लगाना सही हो सकता है, लेकिन उसे व्यक्तिगत अधिकारी की सैलरी से वसूलना गलत है।
सुनवाई के दौरान एक गंभीर मुद्दा सरकारी वकीलों की भारी कमी का भी सामने आया। जस्टिस कथपालिया ने टिप्पणी की कि दिल्ली में पब्लिक प्रॉसीक्यूटर्स की कमी अब एक "स्थायी समस्या" (perennial problem) बन गई है। इस कमी की वजह से आपराधिक मामलों के ट्रायल और जमानत की सुनवाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। कोर्ट ने नाराजगी जताई कि राज्य सरकार ने इस समस्या को हल करने के लिए अब तक कोई गंभीर कदम नहीं उठाए हैं।
अहमद के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश गुप्ता ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट को पहले भी वकीलों की इस किल्लत के बारे में बताया जा चुका है और यह मामला पहले से ही हाई कोर्ट की एक डिवीजन बेंच के सामने लंबित है। हाई कोर्ट ने फिलहाल सैलरी से रिकवरी पर रोक लगा दी है, लेकिन राज्य पर लगाए गए जुर्माने को बरकरार रखा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी 2027 को होगी, तब तक राज्य सरकार को अपनी विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।