IRCTC मनी लॉन्ड्रिंग केस: सुजाता होटल के खिलाफ आरोप तय करने पर दिल्ली हाईकोर्ट की रोक

Kittu Kumari5 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
IRCTC मनी लॉन्ड्रिंग केस: सुजाता होटल के खिलाफ आरोप तय करने पर दिल्ली हाईकोर्ट की रोक

IRCTC के दो होटलों के कॉन्ट्रैक्ट में कथित अनियमितताओं और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट ने सोमवार को सुजाता होटल प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ आरोप तय (framing charges) करने वाले ट्रायल कोर्ट के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। जस्टिस सचिन दत्ता की बेंच ने सुजाता होटल द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

यह पूरा मामला उस समय शुरू हुआ जब सीबीआई ने पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल के दौरान रांची और पुरी में भारतीय रेलवे के दो बीएनआर होटलों के संचालन और रखरखाव के ठेके देने में गड़बड़ी की जांच की। प्रवर्तन निदेशालय (ED) का आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया में हेराफेरी की गई ताकि सुजाता होटल को फायदा पहुंचाया जा सके। ईडी के मुताबिक, इस फायदे के बदले पटना की कीमती जमीन कम कीमत पर डीएमसीपीएल (DMCPL) को ट्रांसफर की गई, जिसे लालू प्रसाद यादव से जुड़े लोग नियंत्रित करते थे।

सुजाता होटल की दलील और कोर्ट का रुख

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सुजाता होटल ने हाईकोर्ट में अपनी अपील में तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने बिना किसी ठोस सबूत के कंपनी पर आरोप लगाए हैं। कंपनी का कहना है कि जिस पटना वाली जमीन के लेनदेन की बात हो रही है, वह न तो उनकी थी और न ही उन्होंने उसे बेचा। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित जमीन का покуп मामला एम/एस डिलाइट मार्केटिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड (DMCPL) से जुड़ा था, न कि उनसे। इसके अलावा, कंपनी ने समयरेखा (chronology) का हवाला देते हुए कहा कि जमीन का सौदा फरवरी 2005 में हुआ था, जबकि कथित गड़बड़ी वाले होटल टेंडर 2006 के हैं।

हाईकोर्ट ने इस अंतरिम राहत को केवल सुजाता होटल तक ही सीमित रखा है और स्पष्ट किया है कि यह अन्य आरोपियों पर लागू नहीं होगा। कोर्ट ने इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) को नोटिस जारी किया है और उन्हें अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है।

गौरतलब है कि इससे पहले 10 सितंबर को राउज एवेन्यू कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव, राब्री देवी, तेजस्वी यादव और सुजाता होटल समेत 16 में से 9 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे। हालांकि, ट्रायल कोर्ट का मानना था कि आरोप तय करने के चरण में केवल यह देखना होता है कि क्या रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री आरोपी के खिलाफ मजबूत संदेह पैदा करती है या नहीं। अब इस कानूनी लड़ाई की अगली कड़ी हाईकोर्ट में तय होगी।

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