दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निजी शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले मजिस्ट्रेट को करनी होगी शिकायतकर्ता की जांच और आरोपी की सुनवाई

नयी दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि निजी शिकायत के मामले में मजिस्ट्रेट किसी अपराध का औपचारिक संज्ञान केवल तभी ले सकते हैं जब वे शपथ पर शिकायतकर्ता और गवाहों की जांच कर लें और आरोपी को सुनने का अवसर दें। न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट को पहले यह तय करना होगा कि आगे बढ़ने के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, न कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 226 के तहत शिकायत को खारिज करना चाहिए। यह फैसला एएनआई (ANI) की रिपोर्ट के आधार पर सामने आया है।
BNSS की धारा 223 और 'जबकि' शब्द का महत्व
अदालत ने BNSS की धारा 223(1) में 'जबकि' (while) शब्द के इस्तेमाल की विशेष रूप से जांच की। हाईकोर्ट ने कहा कि 'while' शब्द बहुत महत्वपूर्ण है और यह दर्शाता है कि शिकायतकर्ता और गवाहों की जांच करना BNSS के तहत संज्ञान लेने की प्रक्रिया का हिस्सा है। अदालत ने पुराने क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की स्थिति से इस प्रक्रिया को अलग बताया। CrPC की धारा 190 के तहत संज्ञान लिया जाता था, जिसके बाद धारा 200 के तहत गवाहों की जांच होती थी, लेकिन नए नियमों में प्रक्रिया बदल गई है।
आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य
खंडपीठ ने BNSS की धारा 223(1) के पहले प्रावधान पर भी गौर किया, जो यह स्पष्ट करता है कि आरोपी को सुनवाई का मौका दिए बिना किसी अपराध का संज्ञान नहीं लिया जाएगा। अदालत ने कहा कि BNSS के प्रावधानों को एक साथ और सामंजस्यपूर्ण तरीके से पढ़ा जाना चाहिए। यह संदर्भ उन याचिकाओं से आया है जिनमें BNSS की धारा 223 के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी को नोटिस जारी करने के आदेशों को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट के इस फैसले से नए कानून के तहत निजी शिकायतों से निपटने के लिए मजिस्ट्रेटों को स्पष्ट प्रक्रिया मिल गई है।