दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में आपसी समझौता नहीं हो सकता

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े आपराधिक मामलों को पीड़ित और आरोपी के बीच आपसी समझौतों के माध्यम से हल नहीं किया जा सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने एक 49 वर्षीय आरोपी की याचिका को खारिज करते हुए दिया, जिसने 2022 में शुरू किए गए गंभीर यौन हमले के आपराधिक मामलों को रद्द करने की मांग की थी। अदालत ने दृढ़ता से कहा कि ऐसे अपराध जघन्य श्रेणी के हैं और समाज पर गंभीर प्रभाव डालते हैं। इसके अनुसार, किसी भी निजी समझौते का कोई कानूनी आधार नहीं होता है।
अदालत का स्पष्ट रुख और कानूनी स्थिति
22 सितंबर 2026 को दिए गए अपने आदेश में, न्यायमूर्ति दत्ता ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मामलों को समझौते के आधार पर समाप्त करने की अनुमति देना कानून के उद्देश्य और न्याय के हितों को विफल कर देगा। अदालत ने रेखांकित किया कि बाल यौन अपराध संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 के तहत किसी अपराध में समझौता करने के लिए बच्चे पीड़ित या उनके परिवार के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इस मामले में कानूनी कार्यवाही पहले ही अभियोजन पक्ष के साक्ष्य दर्ज करने के चरण तक पहुंच चुकी थी, जब आरोपी ने मामले को समाप्त करने की कोशिश की। इस निर्णय के संबंध में विस्तृत जानकारी PTI News रिपोर्ट में उपलब्ध है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का संदर्भ
यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के स्थापित मिसालों के अनुरूप है, जिसमें ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले का फैसला भी शामिल है, जो हाईकोर्ट को जघन्य अपराधों से जुड़े आपराधिक मामलों को रद्द करने के लिए अपनी शक्तियों का उपयोग करने से रोकता है। आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों में POCSO अधिनियम, 2012 के साथ-साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार) और 506 (आपराधिक डराना-धमकाना) के उल्लंघन शामिल हैं। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के गंभीर अपराधों में निजी समझौतों को कानूनी मंजूरी नहीं दी जा सकती।