दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध मानी जाने वाली शादी भी 18 साल से कम उम्र की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (POCSO) एक्ट के तहत अभियोजन से छूट नहीं देती है। 23 सितंबर 2026 को दिए गए और 26 सितंबर 2026 को जारी इस आदेश में जस्टिस संजीव नरूला ने जोर दिया कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है और व्यक्तिगत कानून पॉक्सो एक्ट तथा भारतीय न्याय संहिता (BNS) द्वारा प्रदान किए गए कानूनी सुरक्षा उपायों को खत्म नहीं कर सकते हैं। अदालत ने पुष्टि की कि यौन सहमति की वैधानिक उम्र 18 वर्ष को पर्सनल लॉ में मिलने वाली यौवन (puberty) की अवधारणाओं से बदला नहीं जा सकता है। अदालत ने कहा कि शादी से किसी बच्चे की उम्र नहीं बढ़ती है और शादी से पहले जो व्यक्ति 16 वर्ष का है, वह इन कानूनों के उद्देश्यों के लिए कानूनी रूप से नाबालिग ही रहता है।
अदालत ने स्पष्ट रूप से पॉक्सो एक्ट के तहत किसी भी 'वैवाहिक अपवाद' को मानने से इंकार कर दिया और कहा कि इस तरह की छूट बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनी ढांचे को कमजोर कर देगी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नाबालिग पत्नी की सहमति किसी पति को आपराधिक दायित्व से मुक्त नहीं करती है। यह फैसला तब आया जब हाईकोर्ट ने 28 साल के एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया। उस व्यक्ति पर बीएनएस की धारा 64(1) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था।
इस मामले में जब शादी हुई थी तब पत्नी की उम्र 16 साल और तीन महीने थी।
कानूनी कार्यवाही तब शुरू हुई जब मई 2026 में नाबालिग पत्नी लगभग आठ महीने की गर्भवती होने पर एक सरकारी अस्पताल गई। अस्पताल के अधिकारियों ने पुलिस को इसकी सूचना दी, जिसके बाद एफआईआर दर्ज की गई। हालांकि पत्नी, जिसने बाद में एक मृत बच्चे को जन्म दिया, उसने कहा कि उनका रिश्ता आपसी सहमति से था और इसके लिए कोई दबाव नहीं डाला गया था, लेकिन अदालत ने जोर देकर कहा कि कानून एक सख्त आयु सीमा तय करता है, चाहे व्यक्ति की आंतरिक मंशा कुछ भी हो या उनके बीच कोई भी वैवाहिक रिश्ता क्यों न हो।