दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि धार्मिक रीति-रिवाजों या पर्सनल लॉ के तहत होने वाले बाल विवाह को पोक्सो एक्ट और अन्य आपराधिक कानूनों से छूट नहीं मिल सकती है। यह फैसला जस्टिस संजीव नरूला द्वारा 23 सितंबर 2026 को दिया गया, जिसे 26 और 27 सितंबर को सार्वजनिक किया गया।
अदालत का यह फैसला बिलाल और अन्य द्वारा दायर की गई एक याचिका पर आया है, जिसमें दरियागंज पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर (संख्या 189/2026) को रद्द करने की मांग की गई थी।
इस मामले में 25 साल के एक व्यक्ति ने 16 साल की लड़की से शादी की थी, जिसकी उम्र की पुष्टि गर्भावस्था से जुड़े मेडिकल परीक्षण के दौरान हुई थी। याचिकाकर्ताओं पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 64(1) और पोक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत आरोप दर्ज किए गए थे।
जस्टिस नरूला ने जोर देकर कहा कि शादी से बच्चे की उम्र नहीं बदलती है और मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध मानी जाने वाली शादियां भी पोक्सो एक्ट और बीएनएस के तहत अभियोजन से छूट नहीं देती हैं।
अदालत ने रेखांकित किया कि पर्सनल लॉ ऐसे कानूनों के अपवाद नहीं बना सकते जहां संसद ने स्पष्ट रूप से ऐसी कोई राहत नहीं दी है। न्यायाधीश ने आगे कहा कि पोक्सो एक्ट और बीएनएस की धारा 63 के प्रयोजनों के लिए, यौन गतिविधि के लिए सहमति देने की उसकी कानूनी क्षमता तय करने में लड़की की उम्र ही निर्णायक कारक है।
25 वर्षीय व्यक्ति और अन्य आरोपियों के खिलाफ एफआईआर को रद्द करने से इनकार करते हुए,
अदालत ने केरल हाईकोर्ट द्वारा पहले अपनाए गए एक समान कानूनी रुख का हवाला दिया। अदालत ने पुनः पुष्टि की कि आपराधिक कानून के तहत नाबालिगों की सुरक्षा व्यक्तिगत धार्मिक रीति-रिवाजों से ऊपर है।