RTI के तहत जानकारी बनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाई कोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि RTI एक्ट के तहत विभाग को ऐसी जानकारी बनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जो रिकॉर्ड में मौजूद नहीं है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने सूचना के अधिकार (RTI) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि RTI एक्ट के तहत किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority) को ऐसी जानकारी तैयार करने या संकलित करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उनके पास पहले से रिकॉर्ड के रूप में मौजूद नहीं है। यह फैसला केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के उस आदेश को रद्द करते हुए आया है, जिसमें कोर्ट के जन सूचना अधिकारी (PIO) को उन मामलों का विवरण देने को कहा गया था जिनके फैसले आरक्षित होने के दो महीने बाद तक नहीं सुनाए गए थे।
यह पूरा मामला एक पूर्व न्यायिक अधिकारी पी.डी. गुप्ता द्वारा दायर RTI आवेदन से शुरू हुआ था। गुप्ता ने एक विशेष न्यायाधीश द्वारा सुने गए उन मामलों की जानकारी मांगी थी, जिनमें बहस पूरी होने के दो महीने बाद तक फैसला नहीं आया था। जब PIO ने जवाब दिया कि ऐसा कोई विशिष्ट डेटा संकलित नहीं किया गया है, तो मामला CIC के पास गया। CIC ने PIO को निर्देश दिया था कि वे कोर्ट मास्टर्स द्वारा मुख्य न्यायाधीश को भेजी गई मासिक रिपोर्ट खंगालें और संबंधित सूची उपलब्ध कराएं।
रिकॉर्ड में मौजूद जानकारी ही दी जा सकती है: जस्टिस अमित महाजन
इस याचिका की सुनवाई करते हुए जस्टिस अमित महाजन ने कहा कि हालांकि समय पर फैसले सुनाना सार्वजनिक चिंता का विषय है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जनहित के नाम पर किसी अधिकारी को ऐसी जानकारी बनाने के लिए कहा जाए जो रिकॉर्ड में है ही नहीं। कोर्ट ने RTI एक्ट की धारा 2(j) का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून केवल उस जानकारी तक पहुंच प्रदान करता है जो पहले से उपलब्ध है और प्राधिकरण के नियंत्रण में है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले (CBSE बनाम आदित्य बंदोपाध्याय) का जिक्र करते हुए स्पष्ट किया कि यदि कोई जानकारी कानूनन बनाए रखना जरूरी नहीं है और वह रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं है, तो विभाग उसे इकट्ठा करने या संकलित करने के लिए बाध्य नहीं है।
हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि हालांकि कोर्ट मास्टर्स द्वारा मुख्य न्यायाधीश को गोपनीय मासिक रिपोर्ट भेजी जाती हैं, लेकिन उनका उद्देश्य केवल प्रशासनिक कार्यों के लिए मुख्य न्यायाधीश का ध्यान आकर्षित करना होता है। इन रिपोर्टों को न्यायाधीश-वार सार्वजनिक पहुंच के लिए संकलित करके रखने का कोई नियम नहीं है। अगर यह जानकारी दी जाती, तो PIO को हर केस की जांच करनी पड़ती और समय की गणना कर एक नई सूची बनानी पड़ती, जो कि RTI एक्ट के दायरे से बाहर है।