टेरर फंडिंग केस: बारामूला सांसद अब्दुल रशीद शेख की जमानत याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा
टेरर फंडिंग केस में फंसे बारामूला सांसद अब्दुल रशीद शेख की जमानत याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

आतंकवाद के वित्तपोषण (टेरर फंडिंग) से जुड़े एक मामले में फंसे बारामूला के सांसद अब्दुल रशीद शेख की मुश्किलें फिलहाल कम होती नहीं दिख रही हैं। मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस विकास महाजन की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह निर्णय लिया।
कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
अब्दुल रशीद शेख की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एन हरिहरन ने कोर्ट को बताया कि शेख पिछले 7 सालों से हिरासत में हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इसी तरह के अपराधों के आरोपी शब्बीर अहमद शाह को सुप्रीम कोर्ट ने मार्च में जमानत दे दी थी। वकील ने यह भी साफ किया कि रशीद शेख का नाम मुख्य चार्जशीट में नहीं था, बल्कि उन्हें बाद में दूसरी सप्लीमेंट्री चार्जशीट में नामजद किया गया था। दलील दी गई कि एक सांसद होने के नाते उन्होंने हमेशा भारतीय संविधान में अपना विश्वास जताया है और पत्थरबाजी में घायल लोगों की मदद करना एक राजनेता के तौर पर उनका कर्तव्य था।
दूसरी ओर, NIA की तरफ से वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा और स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर अक्षय मलिक ने जमानत का कड़ा विरोध किया। NIA ने अदालत में दावा किया कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं जिनसे पता चलता है कि शेख ने भारत विरोधी भाषण दिए और गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश की। जांच एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि उनके दो गवाह मुकर चुके हैं (होस्टाइल हो गए हैं), जिससे यह साफ होता है कि गवाहों पर दबाव बनाया गया। NIA ने यह भी तर्क दिया कि अभी केवल आम गवाहों के बयान हुए हैं, जबकि विभाग के अधिकारियों की गवाही होनी बाकी है, इसलिए उन्हें जमानत देना सही नहीं होगा।
बता दें कि अब्दुल रशीद शेख को अगस्त 2019 में गिरफ्तार किया गया था। उन पर UAPA और अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज है। इससे पहले उन्हें विधानसभा चुनाव प्रचार, सांसद के रूप में शपथ लेने और संसद सत्र में शामिल होने के लिए अंतरिम जमानत और पैरोल दी गई थी। अब सबकी नजरें हाई कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं।