शादी के बाद पीड़िता ने जताई सहमति, दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द किया पॉक्सो केस

Kittu Kumari3 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
शादी के बाद पीड़िता ने जताई सहमति, दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द किया पॉक्सो केस

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत दर्ज एक एफआईआर को रद्द कर दिया है। जस्टिस मधु जैन ने 3 अक्टूबर, 2026 को यह आदेश सुनाया। कोर्ट का यह फैसला इसलिए आया क्योंकि जिस नाबालिग पीड़िता के नाम पर केस दर्ज था, उसने अब आरोपी से शादी कर ली है और उनकी एक छोटी बेटी भी है। पीड़िता ने अदालत में स्पष्ट किया कि उसे इस मामले पर कोई आपत्ति नहीं है।

यह मामला साल 2024 में दिल्ली के साउथ डिस्ट्रिक्ट में दर्ज कराया गया था, जब पीड़िता नाबालिग थी। हालांकि, समय के साथ हालात बदल गए और दोनों ने शादी कर ली। कोर्ट ने पीड़िता के 'नो-ऑब्जेक्शन' बयान और उनके पारिवारिक जीवन को देखते हुए इस केस को आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया।

अदालती फैसलों में अलग-अलग नजरिए

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दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली हाई कोर्ट में पॉक्सो मामलों को लेकर अलग-अलग न्यायिक दृष्टिकोण देखने को मिल रहे हैं। जहां जस्टिस मधु जैन ने इस मामले में राहत दी, वहीं हाल ही में जस्टिस संजीव नरुला ने कई ऐसे मामलों में एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था। जस्टिस नरुला का मानना था कि अगर यौन संबंध के समय पीड़िता 18 साल से कम उम्र की थी, तो शादी उसे कानूनी कार्रवाई से नहीं बचा सकती।

उदाहरण के तौर पर, बिलाल नाम के एक व्यक्ति ने दिसंबर 2024 में एक 16 साल की लड़की से शादी की थी। उस मामले में परिवार की सहमति और आपसी रजामंदी के दावों के बावजूद कोर्ट ने केस खारिज करने से मना कर दिया था। अदालत ने जोर दिया था कि सहमति की कानूनी उम्र 18 वर्ष है और इसमें किसी भी व्यक्तिगत कानून के आधार पर छूट नहीं दी जा सकती।

इससे पहले, 16 अप्रैल 2026 को जस्टिस अनुप जयराम भाम्भानी ने भी 'हरमीत सिंह बनाम राज्य' मामले में एक अलग व्याख्या पेश की थी, जिसमें उन्होंने पॉक्सो मुकदमेबाजी की जटिलताओं को सुलझाने के लिए 'डी जुरे' (de jure) और 'डी फैक्टो' (de facto) पीड़ितों के बीच अंतर बताया था।

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