साफ शौचालय 'राइट टू लाइफ' का हिस्सा, दिल्ली हाईकोर्ट अब छात्रों से कराएगा MCD के टॉयलेट्स का सरप्राइज निरीक्षण

Kittu Kumari18 October 20262 min read0 viewsDelhi Local
साफ शौचालय 'राइट टू लाइफ' का हिस्सा, दिल्ली हाईकोर्ट अब छात्रों से कराएगा MCD के टॉयलेट्स का सरप्राइज निरीक्षण

दिल्ली की सड़कों पर चलने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी चुनौती एक साफ सार्वजनिक शौचालय ढूंढना होता है। इसी गंभीर समस्या पर कड़ा रुख अपनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्वच्छ सार्वजनिक शौचालयों तक पहुंचना किसी भी नागरिक के 'जीवन के अधिकार' (Right to Life) का हिस्सा है। अदालत ने पाया कि नगर निगम (MCD) के तमाम दावों के बावजूद शौचालयों की हालत में कोई खास सुधार नहीं हुआ है, जिसके कारण लोगों की शिकायतें लगातार कोर्ट पहुंच रही हैं।

अदालत ने अब एक अनोखा तरीका निकाला है ताकि MCD की जवाबदेही तय की जा सके। एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे और जस्टिस संजय शर्मा की बेंच ने प्रस्ताव दिया है कि तीन प्रमुख सोशल वर्क संस्थानों के छात्र और छात्राएं मिलकर सार्वजनिक शौचालयों का सरप्राइज निरीक्षण करेंगे। इन टीमों को शौचालयों की साफ-सफाई, हाइजीन और उनकी ढांचागत स्थिति की जांच करनी होगी।

छात्रों की टीम करेगी निगरानी, लापरवाह अफसरों पर गिरेगी गाज

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कोर्ट ने इस निगरानी प्रक्रिया के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी के सोशल वर्क विभाग, जामिया मिलिया इस्लामिया कॉलेज ऑफ सोशल वर्क और अदिति महाविद्यालय के प्रमुखों से अनुरोध किया है कि वे छात्र-छात्राओं की टीमें उपलब्ध कराएं। यह टीमें निरीक्षण के बाद फोटो के साथ अपनी रिपोर्ट MCD के एडिशनल कमिश्नर (सफाई) को सौंपेंगी।

इस पूरी प्रक्रिया में जवाबदेही तय करने के लिए कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए हैं:

  • अगर किसी शौचालय में कमी या लापरवाही पाई जाती है, तो संबंधित जोन के डिप्टी कमिश्नर को जवाब देना होगा।
  • लगातार चूक होने पर डिप्टी कमिश्नर और लॉजिस्टिक सहायता देने वाले चीफ इंजीनियर के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी, इसकी जानकारी अधिकारियों को देनी होगी।
  • निरीक्षण करने वाले छात्रों को उनके आने-जाने और फोटोग्राफी के खर्च के लिए मानदेय (Honorarium) दिया जाएगा।

सुनवाई के दौरान MCD के वकील ने बताया कि उन्होंने जियोटैगिंग और चेन्नई के एक संस्थान की मदद से पायलट प्रोजेक्ट चलाया था, लेकिन कोर्ट ने इसे नाकाफी माना। बेंच ने कहा कि कोर्ट हर दिन MCD के कामकाज की निगरानी नहीं कर सकता, इसलिए यह बाहरी निगरानी तंत्र जरूरी है। अदालत ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के सोशल वर्क विभाग को अन्य संस्थानों के साथ समन्वय करने और 2 नवंबर 2026 तक जवाब दाखिल करने को कहा है। साथ ही, MCD के एडिशनल कमिश्नर से भी इसी तारीख तक जवाब मांगा गया है।

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