दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: 17 साल की रेप सर्वाइवर को 29 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की अनुमति
दिल्ली हाई कोर्ट ने 17 वर्षीय रेप सर्वाइवर को 29 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म करने की अनुमति दी है। कोर्ट ने इसे गरिमा के साथ जीने के अधिकार से जोड़ा।

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील मामले में मानवता और अधिकारों को प्राथमिकता देते हुए एक 17 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 29 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थितियों में केवल कानून की समय सीमा को नहीं, बल्कि पीड़िता की मानसिक और शारीरिक स्थिति को देखना जरूरी है।
जस्टिस हरीश वशिष्ठ शंकर ने 24 अक्टूबर 2026 को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट, 1971 के तहत निर्धारित 24 हफ्ते की कानूनी सीमा को पत्थर की लकीर नहीं माना जा सकता। अदालत ने जोर दिया कि न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करते हुए मामले के तथ्यों, पीड़िता की उम्र और मेडिकल राय पर विचार करना अनिवार्य है।
गरिमा के साथ जीने का अधिकार सर्वोपरि
कोर्ट ने इस मामले में दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल के मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर भरोसा जताया, जिसने नाबालिग को इस प्रक्रिया के लिए शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से फिट पाया था। जस्टिस शंकर ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण बात कही कि यौन शोषण के कारण हुई अनचाही प्रेग्नेंसी को जारी रखने के लिए किसी नाबालिग को मजबूर करना और उसे जबरन मां बनाना, उसके गरिमा के साथ जीने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने कुछ कड़े निर्देश भी दिए हैं:
- DNA जांच: ख्याला पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR की जांच को आगे बढ़ाने के लिए भ्रूण के ऊतकों (fetal tissues) को संरक्षित रखने का आदेश दिया गया है, ताकि अनिवार्य DNA विश्लेषण किया जा सके।
- खर्च और गोपनीयता: इस पूरी प्रक्रिया का सारा मेडिकल खर्च दिल्ली सरकार उठाएगी। साथ ही, पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।
- आपातकालीन स्थिति: कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि भ्रूण जीवित पैदा होता है, तो उसे आवश्यक चिकित्सा सहायता दी जाए और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को तुरंत सूचित किया जाए।