पीएम मोदी और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के विदेशी दौरों के फ्लाइट रिकॉर्ड सार्वजनिक करने से दिल्ली हाई कोर्ट का इनकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की विदेश यात्राओं से जुड़े फ्लाइट रिकॉर्ड्स को सार्वजनिक करने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें भारतीय वायु सेना को इन यात्राओं के रिकॉर्ड साझा करने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस अमित महाजन ने स्पष्ट किया कि ऐसी संवेदनशील जानकारी को उजागर करने से राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रधानमंत्री की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
यह पूरा विवाद एक आरटीआई (RTI) आवेदन से शुरू हुआ था। रिटायर्ड कमोडोर लोकेश के. बत्रा ने 2018 में एक आवेदन दायर कर अप्रैल 2013 से लेकर आवेदन की तारीख तक भारतीय वायु सेना के विमानों से प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं की जानकारी मांगी थी। वायु सेना ने कुछ जानकारियां तो दीं, लेकिन 'स्पेशल फ्लाइट रिटर्न्स' (SFR-II) की कॉपियां देने से इनकार कर दिया। वायु सेना का तर्क था कि इन दस्तावेजों में विमान, क्रू, यात्रियों और एसपीजी (SPG) कर्मियों की गोपनीय जानकारी है, जिसे सार्वजनिक करना जोखिम भरा हो सकता है।
सुरक्षा जोखिमों को प्राथमिकता: कोर्ट की टिप्पणी
मामला जब हाई कोर्ट पहुंचा, तो वायु सेना ने दलील दी कि इन रिकॉर्ड्स में यात्रियों के पद, पहचान संख्या और सुरक्षा एजेंसी के विवरण शामिल हैं। अगर यह जानकारी सार्वजनिक होती है, तो सुरक्षा व्यवस्था के पैटर्न और तैनात कर्मियों की पहचान उजागर हो सकती है। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि इन यात्राओं पर सरकारी पैसा खर्च हुआ है, इसलिए यह सार्वजनिक हित का मामला है और जनता को यह जानने का हक है कि कौन लोग साथ गए थे।
कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि केवल सरकारी धन के खर्च होने मात्र से ऐसी जानकारी साझा करना उचित नहीं है, जिससे सुरक्षा व्यवस्था से समझौता हो। जस्टिस महाजन ने कहा कि "प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर सार्वजनिक धन खर्च होने का तथ्य अपने आप में ऐसी जानकारी के खुलासे को उचित नहीं ठहराता, जो सुरक्षा इंतजामों को खतरे में डाल सकती है।"
हाई कोर्ट ने माना कि भारतीय वायु सेना ने आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(a) और 8(1)(g) के तहत जानकारी देने से इनकार कर बिल्कुल सही किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल नामों को हटा देने (redaction) से सुरक्षा जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हो जाते, इसलिए सीआईसी का आदेश गलत था।