पासपोर्ट फीस बढ़ोतरी पर दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला, याचिका खारिज कर कहा- 14 साल में 67% वृद्धि जायज
दिल्ली हाई कोर्ट ने पासपोर्ट फीस में बढ़ोतरी को चुनौती देने वाली PIL को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने इसे सरकार का पॉलिसी मामला बताया।

पासपोर्ट बनवाने और रिन्यू कराने की फीस में हुई बढ़ोतरी को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिछले 14 वर्षों में फीस में लगभग 67 प्रतिशत की जो वृद्धि हुई है, उसे अनुचित या unreasonable नहीं माना जा सकता।
यह मामला 'प्रवासी लीगल सेल' द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा था, जिसमें पासपोर्ट (संशोधन) नियम, 2026 के तहत बढ़ाई गई फीस पर सवाल उठाए गए थे। याचिकाकर्ता का तर्क था कि भारत में रहने वाले आवेदकों और विदेशों में रहने वाले भारतीयों (NRIs) के लिए फीस में काफी अंतर है, जिससे प्रवासी मजदूरों और कम आय वाले भारतीयों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
पॉलिसी में हस्तक्षेप नहीं करेगा कोर्ट
एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस संजय शर्मा की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि पासपोर्ट फीस का निर्धारण पूरी तरह से सरकार के पॉलिसी डोमेन (नीतिगत दायरे) में आता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब तक शुल्क अत्यधिक या অযৌক্তিক न हों, तब तक न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी थी कि विदेश में रहने वाले कुछ भारतीयों के लिए रिन्यूअल शुल्क बढ़कर करीब 12,000 रुपये हो गया है, जो भारत में रहने वालों की तुलना में लगभग 5,000 रुपये अधिक है। वकील ने कहा कि इसका सबसे बुरा असर खाड़ी देशों में काम करने वाले कम वेतन वाले भारतीय मजदूरों पर पड़ेगा। याचिका में यह भी सुझाव दिया गया था कि आर्थिक रूप से कमजोर प्रवासियों के लिए छूट की व्यवस्था होनी चाहिए।
हालांकि, बेंच ने इस दलील पर सवाल उठाया कि किसी प्रवासी नागरिक की आर्थिक कमजोरी का निर्धारण कैसे होगा और इसकी पुष्टि कौन करेगा। कोर्ट ने पाया कि चूंकि फीस में आखिरी बार 2012 में बढ़ोतरी हुई थी, इसलिए 14 साल के अंतराल में 67% की वृद्धि तर्कसंगत है। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया और सरकार के फैसले को बरकरार रखा।