दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जो आरोपी नार्को एनालिसिस टेस्ट से साफ इनकार कर चुका है, उसे शिकायतकर्ता के कहने पर जबरन टेस्ट के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे टेस्ट के लिए सहमति एक व्यक्तिगत और बेहद जरूरी सुरक्षा कवच है। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने 2017 में दर्ज एक एफआईआर के सिलसिले में मृत 21 वर्षीय युवती के पिता की याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में निचली अदालत और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें आरोपियों के नार्को टेस्ट की मांग को ठुकरा दिया गया था।
अदालत ने गौर किया कि
दो आरोपियों, जसपाल उर्फ टिंकू और विवेक कुमार उर्फ मोनू ने ट्रायल कोर्ट के सामने अलग-अलग बयान देकर कहा था कि वे नार्को टेस्ट नहीं कराना चाहते। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने माना था कि उन पर यह टेस्ट जबरन नहीं थोपा जा सकता। हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में केवल दो आरोपियों के इनकार का जिक्र था, लेकिन कार्रवाई इस आधार पर आगे बढ़ी कि तीनों जीवित आरोपियों ने टेस्ट से मना कर दिया है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि हत्या एक बंद कमरे में हुई थी जहां किसी गवाह के होने की संभावना नहीं है, इसलिए सच सामने लाने के लिए नार्को टेस्ट जैसे वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल होना चाहिए।
अपनी याचिका में यह भी दलील दी गई थी कि पीड़िता और उसके परिवार को अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष जांच और ट्रायल का अधिकार है। याचिका को खारिज करते हुए
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 'सेल्वी' मामले के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि किसी व्यक्ति पर जबरन नार्को या पॉलीग्राफ टेस्ट करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना था कि जनहित का हवाला देकर भी ऐसे टेस्ट जबरन नहीं थोपे जा सकते। इसके बाद अदालत ने 'अमलेश कुमार' मामले के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया कि बिना मर्जी के नार्को टेस्ट कराना अनुच्छेद 20(3) के तहत आत्म-दोष से सुरक्षा के अधिकार का उल्लंघन है।
अदालत ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि
यदि कोई आरोपी खुद आवेदन करके भी नार्को टेस्ट कराने का पूर्ण अधिकार नहीं रखता, तो शिकायतकर्ता को भी यह हक नहीं मिल सकता कि वह किसी अनिच्छुक आरोपी पर इस टेस्ट के लिए दबाव बनाए। अदालत ने स्वीकार किया कि मृतका के पिता को अपनी बेटी की हत्या पर गहरा दुख है और उन्हें न्याय पाने का पूरा अधिकार है, लेकिन पीड़िता के हित आरोपी को मिले संवैधानिक सुरक्षा उपायों से ऊपर नहीं हो सकते। अंत में,
हाईकोर्ट ने सत्र अदालत और निचली अदालत के आदेशों में कोई अवैधता नहीं पाई और स्पष्ट किया कि चूंकि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, इसलिए याचिकाकर्ता कानून के तहत आगे की जांच या उसकी निगरानी के लिए संबंधित अदालत में गुहार लगा सकता है।