महिलाओं के लिए सिर्फ 14 शौचालय? दिल्ली हाई कोर्ट ने MCD की लगाई क्लास

देश की राजधानी दिल्ली में महिलाओं के लिए बुनियादी सुविधाओं की कमी अब कानूनी लड़ाई का केंद्र बन गई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने शहर में महिलाओं के लिए समर्पित सार्वजनिक शौचालयों की बदहाली और उनकी भारी कमी पर गहरी चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने इस बात पर सख्त नाराजगी जताई कि पूरे शहर की महिला आबादी के लिए नगर निगम (MCD) ने केवल 14 समर्पित सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं, जो कि बेहद निराशाजनक है।
एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस संजय शर्मा की बेंच ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि स्वच्छ सार्वजनिक शौचालयों का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' का एक अभिन्न हिस्सा है। कोर्ट ने कहा कि MCD स्वच्छता और पहुंच योग्य सुविधाएं प्रदान करने में पूरी तरह विफल रही है। यह मामला जन सेवा वेलफेयर सोसाइटी द्वारा दायर एक याचिका के बाद सामने आया है, जिस पर कोर्ट 2023 से लगातार नजर रखे हुए है।
अब छात्रों की टीम करेगी औचक निरीक्षण
सिर्फ कागजों पर रिपोर्ट लेने के बजाय, हाई कोर्ट ने अब जमीनी हकीकत जांचने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया है। कोर्ट ने प्रस्ताव दिया है कि दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क, जामिया मिलिया इस्लामिया के कॉलेज ऑफ सोशल वर्क और अदिति महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं की टीमें बनाई जाएं। ये टीमें बिना किसी पूर्व सूचना के शौचालयों का निरीक्षण करेंगी, वहां की तस्वीरें लेंगी और अपनी रिपोर्ट सीधे MCD के एडिशनल कमिश्नर को सौंपेंगी।
अदालत ने चेतावनी दी है कि यदि इन औचक निरीक्षणों में लगातार कमियां पाई गईं, तो संबंधित डिप्टी कमिश्नर और चीफ इंजीनियर के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। हैरानी की बात यह है कि दिल्ली सरकार ने बाजारों, पार्कों और सड़कों के किनारे नए टॉयलेट ब्लॉक बनाने के लिए 300 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया था, लेकिन इसके बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं।
कोर्ट ने अब MCD और संबंधित शैक्षणिक संस्थानों को 2 नवंबर 2026 तक अपनी अनुपालन रिपोर्ट जमा करने का समय दिया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि महिलाओं को सुरक्षित और स्वच्छ शौचालय मिल सकें।