नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लीव एनकैशमेंट रिटायरल बकाये का ही हिस्सा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के आदेश को चुनौती दी गई थी। यह पूरा मामला एक कर्मचारी की सेवानिवृत्ति और उसके बकाये के भुगतान में देरी से जुड़ा हुआ है जो 30 नवंबर 2021 को सेवानिवृत्त हुए थे।
केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण यानी कैट ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे कर्मचारी के वेतन को ठीक करें और पेंशन तथा अन्य रिटायरल बकाये का पुनरीक्षण करें। इस प्रक्रिया में देरी होने पर जीपीएफ दरों के हिसाब से ब्याज देने का भी आदेश दिया गया था। कर्मचारी ने लीव एनकैशमेंट पर ब्याज न मिलने पर कैट का रुख किया था। अधिकारियों का तर्क था कि नियमों के तहत लीव एनकैशमेंट पर ब्याज देने का कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है। कैट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा था कि रिटायरल बकाये में अत्यधिक देरी होने पर कर्मचारी मुआवजे के तौर पर ब्याज पाने का हकदार है।
जस्टिस सी हरि शंकर और जस्टिस निवेदिता अनिल शर्मा की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस बात में कोई विवाद नहीं हो सकता कि लीव एनकैशमेंट रिटायरल बकाये के दायरे में आता है।
अदालत ने पाया कि अधिकारियों ने कैट के उन आदेशों को चुनौती नहीं दी थी जिनमें यह स्पष्ट किया गया था कि लीव एनकैशमेंट रिटायरल बकाये में शामिल है। हाईकोर्ट ने माना कि सेवानिवृत्ति के समय जमा बिना उपयोग की छुट्टी के लिए मिलने वाला भुगतान रिटायरल बकाया ही होता है।
हाईकोर्ट ने पाया कि कैट ने अधिकारियों के खिलाफ कोई अवमानना की कार्रवाई नहीं की थी बल्कि केवल अपने पिछले आदेश का पालन करने को कहा था। अदालत ने केंद्र सरकार की याचिका को यह पाते हुए खारिज कर दिया कि कैट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं बनता है। इस मामले की अगली सुनवाई कैट के समक्ष अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए तय की गई थी।