दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश: निजी अस्पताल में इलाज का खर्च चुकाए दिल्ली सरकार
दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वह एक मान्यता प्राप्त पत्रकार की पत्नी के निजी अस्पताल के इलाज का खर्च वापस करे।

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दिल्ली सरकार को निर्देश दिया है कि वह एक मान्यता प्राप्त पत्रकार की पत्नी के निजी अस्पताल में हुए इलाज का पूरा खर्च वापस करे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोविड-19 महामारी के दौरान आपातकालीन स्थिति में निजी अस्पताल में कराए गए इलाज के रीइम्बर्समेंट से इनकार नहीं किया जा सकता।
यह पूरा मामला पत्रकार रविंदर गुप्ता और स्वास्थ्य सेवा निदेशक (Director of Health Services) के बीच था। याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी के इलाज पर खर्च हुए 11,83,105.21 रुपये की मांग की थी। दरअसल, उनकी पत्नी को दाहिनी फीमोरल आर्टरी में 'सिम्पटोमैटिक स्यूडो-एन्यूरिज्म' की समस्या थी। उन्हें पहले जीबी पंत अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन वहां कोविड-19 प्रतिबंधों के कारण जरूरी वैस्कुलर सर्जरी उपलब्ध नहीं थी, जिसके बाद उन्हें सर गंगा राम अस्पताल और सर गंगा राम सिटी अस्पताल रेफर किया गया।
इमरजेंसी को नजरअंदाज नहीं कर सकती सरकार
पत्रकार ने दिल्ली प्रेस रिपोर्टर और मेडिकल असिस्टेंस रूल्स, 1955 के तहत रिफंड के लिए आवेदन किया था। हालांकि, स्वास्थ्य सेवा निदेशक ने यह कहकर दावे को खारिज कर दिया था कि वह सर्जरी कोई इमरजेंसी नहीं थी। जस्टिस अमित महाजन ने मामले की सुनवाई करते हुए अस्पताल द्वारा दिए गए इमरजेंसी सर्टिफिकेट और रेफरल लेटर को आधार बनाया और माना कि सर्जरी वास्तव में तत्काल जरूरी थी।
कोर्ट ने सरकार की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि नियम 7 केवल अस्पताल की हड़ताल के दौरान लागू होता है। अदालत ने कहा कि अस्पताल में हड़ताल होना और अस्पताल का कोविड-19 फैसिलिटी घोषित होना, दोनों ही स्थितियों में मरीज को नियमित सेवाओं से वंचित होना पड़ता है, इसलिए इन्हें एक समान माना जाना चाहिए।
हाई कोर्ट ने सरकार के इनकार वाले पत्र को रद्द करते हुए आदेश दिया कि 8 हफ्ते के भीतर पूरी राशि का भुगतान किया जाए। साथ ही, कोर्ट ने सरकार को यह छूट भी दी कि वह इस राशि की वसूली उस जिम्मेदार अधिकारी से कर सकती है जिसने समय पर काउंटर-एफिडेविट दाखिल नहीं किया। इस फैसले का मान्यता प्राप्त पत्रकार कल्याण समिति ने स्वागत किया है, इसे पत्रकारों के स्वास्थ्य अधिकारों की जीत बताया है।