गुरुग्राम हादसा: दिल्ली हाई कोर्ट ने बढ़ाया मुआवजा, अब मिलेंगे 53 लाख रुपये

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में यह साफ कर दिया है कि अगर किसी सड़क हादसे के मामले में ड्राइवर को आपराधिक अदालत से बरी कर दिया जाता है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पीड़ित को मुआवजा नहीं मिलेगा। अदालत ने 2006 में गुरुग्राम में हुए एक दर्दनाक हादसे के मामले में मुआवजे की राशि को 37 लाख रुपये से बढ़ाकर अब 53 लाख रुपये कर दिया है।
यह पूरा मामला साल 2006 का है, जब एक ट्रक की टक्कर से एक 21 वर्षीय युवक गंभीर रूप से घायल हो गया था। वह उस समय बी.कॉम सेकंड ईयर का छात्र था। इस हादसे ने उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी। इलाज के दौरान उसे करीब 27 सर्जरी से गुजरना पड़ा और चोटें इतनी गंभीर थीं कि वह अपनी प्रजनन क्षमता (fertility) खो बैठा। आज वह व्यक्ति 37 साल का हो चुका है, लेकिन उस हादसे के जख्म आज भी उसके साथ हैं।
आपराधिक बरी होना 'क्लीन चिट' नहीं: जस्टिस अनीश दयाल
इस मामले की सुनवाई जस्टिस अनीश दयाल की बेंच ने की। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर किसी ड्राइवर को 'संदेह का लाभ' (benefit of doubt) देकर बरी किया गया है, तो इसे सिविल मुआवजे के मामलों में 'क्लीन चिट' नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गवाहों की कमी से हादसा खत्म नहीं हो जाता और न ही पीड़ित की तकलीफें कम होती हैं।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आपराधिक कार्यवाही में लापरवाही साबित करने का पैमाना और सिविल अधिकारों के तहत मुआवजे का पैमाना अलग-अलग होता है। चूंकि हादसे में शामिल ट्रक का बीमा नहीं था, इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया कि मुआवजे की पूरी राशि यानी 53 लाख रुपये, 9 प्रतिशत ब्याज के साथ ट्रक मालिक को भुगतान करने होंगे।
कोर्ट ने भावुक होते हुए कहा कि हालांकि मुआवजे से किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य और जीवन वापस पहले जैसा नहीं हो सकता, लेकिन पीड़ित को मिलने वाली आर्थिक राहत उसका अधिकार है, जिसे नकारा नहीं जा सकता।